Search
Close this search box.

नई दिल्ली में आयोजित विश्वमांगल्य सभा के राष्ट्रीय सम्मेलन में ‘युगानुकूल मातृत्व’ विषय पर मंथन, सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का प्रेरक संबोधन

नई दिल्ली में आयोजित विश्वमांगल्य सभा के राष्ट्रीय सम्मेलन में ‘युगानुकूल मातृत्व’ विषय पर मंथन, सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का प्रेरक संबोधन

नई दिल्ली। देश और समाज में सांस्कृतिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का प्रसार करने के उद्देश्य से कार्यरत विश्वमांगल्य सभा द्वारा नई दिल्ली स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में “युगानुकूल मातृत्व” विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों से लगभग 250 प्रबुद्ध महिलाओं ने सहभागिता कर मातृत्व, परिवार, संस्कार और राष्ट्र निर्माण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया।

कौन हैं विवेक ठाकुर? शिक्षा जगत में पहचान से लेकर लगातार विवादों तक, स्कॉलर्स डेन संचालक की पूरी कहानी

देशभर से पहुंचीं प्रबुद्ध महिलाओं की सहभागिता

इस राष्ट्रीय सम्मेलन में जम्मू, श्रीनगर, अनंतनाग, लेह-लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मणिपुर सहित देश के अनेक क्षेत्रों से आई महिलाओं ने भाग लिया। विविध सामाजिक, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जुड़ी प्रतिभागियों ने अपने-अपने क्षेत्रों के अनुभव साझा किए तथा बदलते समय में परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में मातृत्व की भूमिका पर सार्थक चर्चा की।

कार्यक्रम में सहभागी महिलाओं ने इस बात पर विशेष बल दिया कि आधुनिक परिवेश में भी भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और नैतिक शिक्षा को नई पीढ़ी तक प्रभावी रूप से पहुँचाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का मिला सौभाग्य

सम्मेलन में अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्राप्त होना मेरे लिए अत्यंत गौरव और प्रेरणा का विषय रहा। देश के विभिन्न राज्यों से आई विदुषी एवं समाजसेवी महिलाओं के साथ संवाद और विचारों का आदान-प्रदान अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक अनुभव रहा। इस मंच ने विभिन्न क्षेत्रों में किए जा रहे सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यों को समझने तथा उनसे सीखने का अवसर भी प्रदान किया।

विदेशी ताकतों और स्वार्थ की राजनीति से सावधान रहें युवा, राष्ट्रहित को रखें सर्वोपरि

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का महत्वपूर्ण मार्गदर्शन

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक परम पूजनीय डॉ. मोहन भागवत का प्रेरणादायक एवं विचारोत्तेजक संबोधन रहा। उन्होंने पहली बार “युगानुकूल मातृत्व” जैसे महत्वपूर्ण विषय पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए और बदलते सामाजिक परिवेश में मातृत्व की भूमिका को राष्ट्र निर्माण का आधार बताया।

उन्होंने कहा कि मातृत्व केवल परिवार तक सीमित उत्तरदायित्व नहीं है, बल्कि यह समाज और राष्ट्र के चरित्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। यदि बच्चों को बचपन से ही उत्तम संस्कार, नैतिक शिक्षा, अनुशासन, संवेदनशीलता और राष्ट्रभक्ति का वातावरण मिले तो वे भविष्य में एक सशक्त, जिम्मेदार और जागरूक नागरिक बन सकते हैं।

कुटुंब प्रबोधन और आधुनिक माध्यमों पर दिया विशेष बल

डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में कुटुंब प्रबोधन को समय की आवश्यकता बताते हुए परिवार संस्था को मजबूत बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि बदलते समय के साथ आधुनिक तकनीक और संचार के साधनों का सकारात्मक उपयोग करते हुए नई पीढ़ी तक भारतीय जीवन मूल्यों, सांस्कृतिक परंपराओं और नैतिक आदर्शों को पहुँचाना आवश्यक है।

‘तनखैया’ कहकर जिस IAS पर बरसे थे आज़म खान, अब उसी की प्रशासनिक कार्रवाई से बढ़ीं जौहर यूनिवर्सिटी की मुश्किलें

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि समाज की महिलाओं की भूमिका केवल परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि वे शिक्षा, संस्कार, सामाजिक नेतृत्व और राष्ट्र निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान देने की क्षमता रखती हैं। यदि मातृत्व आधुनिक सोच और भारतीय मूल्यों के संतुलन के साथ आगे बढ़ेगा, तो समाज अधिक जागरूक, सशक्त और संस्कारित बनेगा।

राष्ट्र निर्माण में मातृत्व की भूमिका पर हुआ सार्थक मंथन

संगोष्ठी के दौरान विभिन्न वक्ताओं ने भी अपने विचार रखते हुए कहा कि वर्तमान समय में मातृत्व को केवल जैविक भूमिका के रूप में नहीं, बल्कि मूल्यपरक शिक्षा, सामाजिक समरसता, पर्यावरण चेतना, पारिवारिक एकता और राष्ट्रीय विकास के व्यापक दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि मातृत्व के माध्यम से ही आने वाली पीढ़ियों में चरित्र, करुणा, कर्तव्यबोध और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे गुणों का विकास संभव है।

समाज और राष्ट्र के लिए प्रेरणादायी पहल

कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि यदि परिवार, समाज और शिक्षण संस्थान मिलकर नई पीढ़ी के सर्वांगीण विकास के लिए कार्य करें तथा मातृत्व की गरिमा और भूमिका को युगानुकूल दृष्टि से सशक्त बनाया जाए, तो भारत का भविष्य और अधिक उज्ज्वल, संस्कारित तथा आत्मनिर्भर बन सकता है। विश्वमांगल्य सभा का यह आयोजन सामाजिक जागरूकता, सांस्कृतिक संरक्षण और राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं प्रेरणादायक पहल के रूप में देखा गया।

Leave a Comment