विदेशी ताकतों और स्वार्थ की राजनीति से सावधान रहें युवा, राष्ट्रहित को रखें सर्वोपरि
देश को तोड़ने नहीं, जोड़ने का संकल्प लें – एडवोकेट नीरज सोलंकी, जिला संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच, मुरादाबाद
लेखक: एडवोकेट नीरज सोलंकी
पद: जिला संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच, मुरादाबाद
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भारत आज विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है। यह युवा शक्ति केवल जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी पूंजी है। आने वाले वर्षों में भारत की आर्थिक प्रगति, वैज्ञानिक उपलब्धियाँ, तकनीकी नवाचार, सामाजिक परिवर्तन और वैश्विक नेतृत्व की दिशा इसी युवा पीढ़ी के हाथों तय होगी। यदि युवाओं की ऊर्जा शिक्षा, अनुसंधान, उद्यमिता, कौशल विकास, सामाजिक सेवा और राष्ट्र निर्माण में लगेगी, तो भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ेगा। वहीं यदि यही ऊर्जा नफरत, हिंसा, दुष्प्रचार, वैचारिक कट्टरता और राजनीतिक स्वार्थों में व्यर्थ हो गई, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान देश, समाज और आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ेगा।
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लोकतंत्र में विरोध का अधिकार, लेकिन जिम्मेदारी के साथ
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण विरोध और सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार देता है। यह लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। किंतु प्रत्येक अधिकार के साथ एक जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। जब विरोध शांतिपूर्ण, तथ्यों पर आधारित और जनहित में होता है, तब वह लोकतंत्र को मजबूत करता है। लेकिन जब विरोध प्रदर्शन हिंसा, तोड़फोड़, सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान, समाज में वैमनस्य फैलाने या युवाओं को भड़काने का माध्यम बन जाए, तब वह लोकतांत्रिक आंदोलन नहीं बल्कि अराजकता का रूप ले लेता है।
सार्वजनिक संपत्ति देश के प्रत्येक नागरिक की संपत्ति होती है। उसे नुकसान पहुँचाना अंततः राष्ट्र की संपत्ति को क्षति पहुँचाना है। इसलिए किसी भी प्रकार के आंदोलन में कानून, संविधान और सामाजिक मर्यादा का पालन सर्वोपरि होना चाहिए।
सोशल मीडिया के दौर में सतर्क रहने की आवश्यकता
वर्तमान समय डिजिटल युग का है, जहाँ सूचना कुछ ही क्षणों में करोड़ों लोगों तक पहुँच जाती है। दुर्भाग्य से इसी माध्यम का उपयोग कई बार झूठी खबरें, आधे-अधूरे वीडियो, भ्रामक दावे और भावनात्मक संदेश फैलाने के लिए भी किया जाता है। अनेक अवसरों पर संगठित दुष्प्रचार अभियान समाज में भ्रम, अविश्वास और विभाजन का वातावरण बनाने का प्रयास करते हैं।
ऐसे समय में युवाओं का कर्तव्य है कि वे किसी भी सूचना को बिना सत्यापन के स्वीकार या साझा न करें। विश्वसनीय स्रोतों से तथ्य जानें, विभिन्न पक्षों को समझें और विवेकपूर्ण निर्णय लें। डिजिटल साक्षरता आज केवल तकनीकी आवश्यकता नहीं बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी बन चुकी है।
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राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचने की आवश्यकता
समय-समय पर कुछ राजनीतिक दल, विभिन्न संगठन तथा स्वार्थी तत्व युवाओं की भावनाओं का उपयोग अपने राजनीतिक या वैचारिक उद्देश्यों के लिए करने का प्रयास करते हैं। चुनावी लाभ, वैचारिक विस्तार अथवा तात्कालिक राजनीतिक हितों के लिए युवाओं को टकराव, उग्र आंदोलनों और सामाजिक विभाजन की ओर धकेलना लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।
राजनीति का मूल उद्देश्य समाज को जोड़ना, समस्याओं का समाधान करना, लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत करना और जनकल्याण सुनिश्चित करना होना चाहिए। किसी भी राजनीतिक विचारधारा का मूल्यांकन उसके कार्यों और राष्ट्रहित के आधार पर होना चाहिए, न कि भावनात्मक उकसावे या प्रचार के आधार पर।
युवाओं को मिले राष्ट्र निर्माण की दिशा
मैं देश की सभी राजनीतिक पार्टियों, सामाजिक संगठनों, छात्र संगठनों और जनप्रतिनिधियों से विनम्र आग्रह करता हूँ कि वे युवाओं को भड़काने की राजनीति से ऊपर उठें। देश के युवाओं को रोजगार, शिक्षा, कौशल विकास, स्टार्टअप, अनुसंधान, स्वदेशी उद्योग, पर्यावरण संरक्षण, डिजिटल नवाचार, कृषि सुधार और सामाजिक समरसता जैसे विषयों की ओर प्रेरित किया जाना चाहिए।
आज भारत के सामने अनेक अवसर हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, अंतरिक्ष विज्ञान, हरित ऊर्जा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृषि तकनीक और वैश्विक व्यापार जैसे क्षेत्रों में युवा अपनी प्रतिभा से विश्व में भारत का नाम रोशन कर सकते हैं। यदि युवाओं की ऊर्जा इन क्षेत्रों में लगेगी तो भारत की प्रगति को नई गति मिलेगी।
राष्ट्रीय एकता ही भारत की सबसे बड़ी शक्ति
भारत की पहचान उसकी विविधता में निहित है। विभिन्न धर्म, भाषाएँ, संस्कृतियाँ, परंपराएँ और जीवनशैलियाँ हमारी साझा विरासत हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” केवल नारे नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं।
जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र या राजनीतिक विचारधारा के आधार पर समाज को बाँटने का हर प्रयास राष्ट्र को कमजोर करता है। हमें ऐसे प्रत्येक प्रयास का लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से विरोध करना चाहिए जो समाज में वैमनस्य, घृणा और अविश्वास फैलाता हो। मतभेद लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन मनभेद कभी भी राष्ट्रहित में नहीं हो सकते।
स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और सामाजिक उत्तरदायित्व का महत्व
स्वदेशी जागरण मंच का स्पष्ट मत है कि भारत की आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आत्मनिर्भरता ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति है। जब देश का युवा स्वदेशी उत्पादों, स्थानीय उद्योगों, नवाचार, कौशल विकास और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को अपनाता है, तब वह केवल अपना भविष्य नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है।
स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देना, भारतीय उद्यमियों का समर्थन करना, रोजगार सृजन में योगदान देना और सामाजिक उत्तरदायित्व निभाना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी साकार होगा जब युवा अपने ज्ञान, कौशल और परिश्रम को राष्ट्रहित में समर्पित करेंगे।
विवेकपूर्ण निर्णय ही सच्ची देशभक्ति है
आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक युवा किसी भी आंदोलन, अभियान, विरोध या सोशल मीडिया ट्रेंड का हिस्सा बनने से पहले उसके उद्देश्य, तथ्य, कानूनी स्थिति और संभावित परिणामों को समझे। केवल भावनाओं के आधार पर निर्णय लेने के बजाय विवेक, तर्क और संविधान की भावना के अनुरूप कदम उठाना ही जिम्मेदार नागरिक की पहचान है।
देशभक्ति केवल नारों तक सीमित नहीं होती। ईमानदारी से पढ़ाई करना, अपने कार्य के प्रति समर्पित रहना, कानून का पालन करना, समाज की सेवा करना, पर्यावरण की रक्षा करना, करों का ईमानदारी से भुगतान करना और राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला प्रत्येक कार्य सच्ची देशभक्ति का उदाहरण है।
युवाओं के नाम संदेश
मेरा देश के युवाओं से आग्रह है कि अपने हाथों में पत्थर नहीं, पुस्तक उठाइए। नफरत नहीं, संवाद अपनाइए। हिंसा नहीं, संविधान का मार्ग चुनिए। अफवाह नहीं, सत्य का साथ दीजिए। विभाजन नहीं, एकता का संदेश दीजिए। किसी के राजनीतिक स्वार्थ का माध्यम बनने के बजाय भारत के उज्ज्वल भविष्य के निर्माता बनिए।
आपकी शिक्षा, आपका चरित्र, आपका अनुशासन, आपकी मेहनत और आपका राष्ट्रप्रेम ही भारत को विश्वगुरु बनाने की सबसे बड़ी शक्ति है।
निष्कर्ष
अंत में मैं देश की सभी राजनीतिक पार्टियों, सामाजिक संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों, जनप्रतिनिधियों तथा जागरूक नागरिकों से यही अपील करता हूँ कि देश को तोड़ने की नहीं, जोड़ने की राजनीति करें। लोकतंत्र में विचारों का मतभेद स्वाभाविक है, लेकिन राष्ट्रीय एकता, संविधान की गरिमा और भारत की अखंडता सर्वोच्च होनी चाहिए।
हम सभी का सामूहिक दायित्व है कि आने वाली पीढ़ियों को ऐसा भारत दें जो सामाजिक रूप से समरस, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर, वैज्ञानिक रूप से अग्रणी, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और राष्ट्रीय दृष्टि से सशक्त हो। यही सच्चे अर्थों में राष्ट्र सेवा है और यही प्रत्येक भारतीय का सर्वोच्च कर्तव्य भी है।
– एडवोकेट नीरज सोलंकी
जिला संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच, मुरादाबाद







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