वाहन बेचकर भी पूरी वसूली मांगने पर बैंक को कोर्ट का झटका, इजराय वाद खारिज
कॉमर्शियल कोर्ट ने कोटक महिंद्रा बैंक पर लगाया 10 हजार रुपये का हर्जाना
मुरादाबाद। कॉमर्शियल कोर्ट, मुरादाबाद ने ऋण से जुड़े एक मामले में कोटक महिंद्रा बैंक को बड़ा झटका देते हुए उसके द्वारा दायर इजराय वाद (निष्पादन वाद) को खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि बैंक ने ऋण के बदले रखे गए वाहन को पहले ही अपने कब्जे में लेकर बेच दिया था और बिक्री से प्राप्त राशि को ऋण खाते में समायोजित भी कर दिया था। इसके बावजूद बैंक ने पूरी बकाया राशि की वसूली का दावा किया।
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Toggleअदालत ने इस मामले में बैंक की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि महत्वपूर्ण तथ्यों को मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर) और न्यायालय के समक्ष सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया गया। न्यायालय के अनुसार, किसी भी पक्ष को न्यायिक प्रक्रिया का लाभ लेने के लिए अदालत के समक्ष सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ रखना चाहिए।
लगभग 9.39 लाख रुपये की वसूली का था दावा
मामले में कोटक महिंद्रा बैंक की ओर से लगभग 9.39 लाख रुपये तथा 20 जून 2024 से 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की वसूली के लिए इजराय वाद दायर किया गया था।
बैंक का दावा था कि ऋणी के खाते में निर्धारित राशि बकाया है और मध्यस्थीय आदेश के आधार पर इस रकम की वसूली कराई जानी चाहिए।
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इसके खिलाफ ऋणी रिषभ की ओर से आपत्ति दाखिल की गई। ऋणी ने न्यायालय को बताया कि उसने 18 जून 2024 को बैंक की सहमति से संबंधित वाहन बैंक को वापस कर दिया था।
ऋणी की ओर से यह भी बताया गया कि वाहन वापस लेने के बाद बैंक ने उसे किसी अन्य व्यक्ति को बेच दिया तथा वाहन की बिक्री से प्राप्त राशि में से लगभग 7.24 लाख रुपये ऋण खाते में समायोजित कर दिए गए।
वाहन बेचने के बाद भी पूरी रकम की मांग पर उठे सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह सामने आया कि यदि बैंक ने वाहन अपने कब्जे में लेकर उसे बेच दिया और बिक्री से प्राप्त 7.24 लाख रुपये की राशि खाते में समायोजित कर दी, तो फिर बैंक द्वारा पूरी मूल बकाया राशि की वसूली किस आधार पर मांगी जा रही थी।
न्यायालय ने रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद पाया कि वाहन की वापसी, उसके बाद बिक्री और बिक्री की रकम के खाते में समायोजन जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों का पर्याप्त उल्लेख बैंक की ओर से मध्यस्थीय कार्यवाही में नहीं किया गया था।
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अदालत ने माना कि इन तथ्यों का सीधा संबंध वास्तविक बकाया रकम से था। इसलिए इनका खुलासा करना आवश्यक था।
मध्यस्थ के समक्ष भी पूरी जानकारी नहीं रखने पर कोर्ट की टिप्पणी
अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि बैंक ने वाहन को पहले ही बेच दिया था, लेकिन बाद की निष्पादन कार्यवाही में उसी वाहन की कुर्की का अनुरोध भी किया गया।
न्यायालय ने इस स्थिति को गंभीरता से लिया। अदालत के अनुसार, जब संबंधित वाहन पहले ही बैंक द्वारा बेचा जा चुका था, तो उसके संबंध में दोबारा कुर्की की मांग करना रिकॉर्ड की वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाता।
कोर्ट ने माना कि निष्पादन न्यायालय के सामने वास्तविक और अद्यतन स्थिति रखना बैंक की जिम्मेदारी थी।
‘स्वच्छ हाथों’ से अदालत में नहीं आने पर कड़ी टिप्पणी
अपने आदेश में न्यायालय ने बैंक की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि बैंक न तो मध्यस्थ के समक्ष और न ही न्यायालय के समक्ष स्वच्छ हाथों से उपस्थित हुआ।
किसी पक्ष द्वारा अदालत से राहत मांगते समय उससे अपेक्षा की जाती है कि वह मामले से जुड़े सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को निष्पक्ष रूप से सामने रखे। विशेष रूप से तब, जब किसी संपत्ति या वाहन को बेचकर उससे प्राप्त रकम पहले ही संबंधित खाते में समायोजित की जा चुकी हो।
अदालत ने इसी आधार पर बैंक द्वारा प्रस्तुत दावे को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
वसूली योग्य वास्तविक रकम का हिसाब देना बैंक की जिम्मेदारी
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ऋण की वसूली के मामले में वास्तव में कितनी रकम बाकी है, इसका सही और स्पष्ट हिसाब प्रस्तुत करना आवश्यक है।
यदि ऋणदाता ने किसी संपत्ति या वाहन को कब्जे में लेकर बेच दिया है, तो बिक्री से प्राप्त रकम को ऋण खाते में समायोजित किए जाने के बाद शेष बकाया राशि का सही विवरण सामने आना चाहिए।
अदालत के अनुसार, एक ही ऋण के संबंध में संपत्ति की बिक्री से प्राप्त रकम का लाभ लेने के बाद उसी संपत्ति या उसकी पूरी मूल कीमत के आधार पर दोबारा वसूली का दावा नहीं किया जा सकता।
10 हजार रुपये का हर्जाना लगाया
मामले में बैंक के इजराय वाद को खारिज करने के साथ ही कॉमर्शियल कोर्ट ने बैंक पर 10 हजार रुपये का हर्जाना भी लगाया।
अदालत ने निर्देश दिया कि बैंक को निर्धारित अवधि के भीतर यह राशि सरकारी कोष में जमा करनी होगी।
आदेश के अनुसार, यदि निर्धारित अवधि में हर्जाने की राशि जमा नहीं की जाती है तो जिलाधिकारी के माध्यम से इसकी वसूली कराई जा सकती है।
फाइनेंस कंपनियों और बैंकों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश
यह फैसला केवल संबंधित पक्षों तक सीमित नहीं है, बल्कि बैंक और वित्तीय संस्थानों द्वारा की जाने वाली ऋण वसूली की प्रक्रिया के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
मामले से यह सिद्धांत सामने आता है कि ऋणदाता को ऋण वसूली की पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बरतनी होगी। यदि किसी वाहन या अन्य संपत्ति को कब्जे में लेकर बेच दिया गया है, तो उसकी बिक्री से प्राप्त रकम और खाते में किए गए समायोजन का पूरा विवरण वसूली की अगली कार्यवाही में प्रस्तुत करना आवश्यक है।
न्यायालय के समक्ष किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाकर या अधूरी जानकारी के आधार पर राहत प्राप्त करने का प्रयास बाद की न्यायिक कार्यवाही में संबंधित पक्ष के लिए परेशानी का कारण बन सकता है।
मामले के प्रमुख बिंदु
- कॉमर्शियल कोर्ट, मुरादाबाद ने कोटक महिंद्रा बैंक का इजराय वाद खारिज कर दिया।
- बैंक ने लगभग 9.39 लाख रुपये और 20 जून 2024 से 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की वसूली का दावा किया था।
- ऋणी के अनुसार, 18 जून 2024 को वाहन बैंक को वापस कर दिया गया था।
- बैंक ने बाद में संबंधित वाहन को दूसरे व्यक्ति को बेच दिया।
- वाहन की बिक्री से प्राप्त लगभग 7.24 लाख रुपये ऋण खाते में समायोजित किए गए।
- अदालत ने माना कि वाहन की वापसी, बिक्री और रकम के समायोजन की महत्वपूर्ण जानकारी पूरी तरह सामने नहीं रखी गई।
- इसके बावजूद निष्पादन कार्यवाही में उसी वाहन की कुर्की का अनुरोध किए जाने पर भी अदालत ने सवाल उठाया।
- न्यायालय ने कहा कि बैंक को वास्तविक बकाया राशि का स्पष्ट और सही हिसाब प्रस्तुत करना चाहिए था।
- अदालत ने बैंक के आचरण पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह स्वच्छ हाथों से न्यायालय के समक्ष नहीं आया।
- बैंक का इजराय वाद खारिज करने के साथ 10 हजार रुपये का हर्जाना लगाया गया।
- हर्जाना निर्धारित अवधि में सरकारी कोष में जमा करना होगा।
- भुगतान न होने पर जिलाधिकारी के माध्यम से हर्जाने की वसूली कराई जा सकती है।
फैसले का व्यापक असर
यह आदेश इस बात को रेखांकित करता है कि बैंक या वित्तीय संस्था द्वारा ऋण की वसूली करते समय केवल बकाया रकम का दावा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस रकम का पूरा हिसाब भी स्पष्ट करना जरूरी है।
विशेष रूप से जब ऋण के बदले रखी गई संपत्ति या वाहन को बेचकर रकम वसूल ली गई हो, तब बिक्री की रकम, खाते में किए गए समायोजन और उसके बाद बची वास्तविक देनदारी का स्पष्ट विवरण न्यायालय के सामने होना चाहिए।
मुरादाबाद कॉमर्शियल कोर्ट का यह आदेश न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता के महत्व को रेखांकित करता है तथा यह संदेश देता है कि अदालत से राहत मांगने वाले पक्ष को सभी महत्वपूर्ण तथ्यों के साथ निष्पक्ष रूप से न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना चाहिए।







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