₹50 हजार की रिश्वत लेते डीडीसी कार्यालय का पेशकार गिरफ्तार, एंटी करप्शन का बड़ा ट्रैप
तीन महीने से लंबित आदेश को वेबसाइट पर अपलोड कराने के नाम पर मांगी गई थी रिश्वत, अधिवक्ता की शिकायत पर हुई कार्रवाई
सागर और ज्वाला समाचार | मुरादाबाद
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Toggleमुरादाबाद में एंटी करप्शन ब्यूरो ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए डिप्टी डायरेक्टर चकबंदी (डीडीसी) कार्यालय के पेशकार सुभाष चंद्र को ₹50 हजार की कथित रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया है। कार्रवाई मंगलवार को दोपहर करीब 3:20 बजे डीडीसी कार्यालय में की गई।
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एंटी करप्शन टीम की इस कार्रवाई के बाद कचहरी परिसर में कुछ समय के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया। आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू किए जाने की जानकारी सामने आई है।
तीन महीने से लंबित था चकबंदी मामले का आदेश
मामला चकबंदी विभाग से जुड़े एक प्रकरण का बताया जा रहा है। जानकारी के अनुसार वरिष्ठ अधिवक्ता ठाकुर ओमवीर सिंह ने चकबंदी से संबंधित मामले में निगरानी (अपील) दाखिल की थी।
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शिकायतकर्ता के अनुसार मामले में बहस पूरी हो चुकी थी, लेकिन इसके बावजूद करीब तीन महीने तक आदेश जारी नहीं किया गया। आदेश जारी होने के बाद उसे विभागीय वेबसाइट पर अपलोड किया जाना भी लंबित था।
अधिवक्ता का आरोप है कि वह लंबे समय तक कार्यालय के चक्कर लगाते रहे, लेकिन उन्हें लगातार आश्वासन ही मिलता रहा। इसी दौरान कथित तौर पर आदेश जारी कराने और उसे ऑनलाइन अपलोड कराने के लिए रिश्वत की मांग की गई।
पहले ₹5 लाख की कथित मांग, बाद में ₹1 लाख पर बनी बात
शिकायतकर्ता अधिवक्ता ठाकुर ओमवीर सिंह के आरोप के मुताबिक, जब उन्होंने मामले की स्थिति जानने के लिए उप संचालक चकबंदी (डीडीसी) ओमप्रकाश अंजोर से मुलाकात की, तो उन्हें कथित रूप से पेशकार से संपर्क करने को कहा गया।
इसके बाद अधिवक्ता ने पेशकार सुभाष चंद्र से संपर्क किया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि बातचीत के दौरान शुरुआत में कथित रूप से ₹5 लाख की रिश्वत मांगी गई।
अधिवक्ता ने इतनी बड़ी रकम देने में असमर्थता जताई। उनके अनुसार बातचीत के बाद कथित रूप से रिश्वत की रकम घटाकर ₹1 लाख कर दी गई।
शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने एकमुश्त ₹1 लाख देने में असमर्थता जताई और कथित तौर पर ₹50 हजार पहले तथा ₹50 हजार बाद में देने की बात तय हुई।
रिश्वत देने के बजाय एंटी करप्शन ब्यूरो में की शिकायत
अधिवक्ता ठाकुर ओमवीर सिंह के अनुसार, उन्होंने रिश्वत की रकम देने के बजाय पूरे मामले की शिकायत एंटी करप्शन ब्यूरो से करने का निर्णय लिया।
शिकायत मिलने के बाद एंटी करप्शन टीम ने मामले की प्राथमिक जांच की। शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच के बाद टीम ने कथित रिश्वतखोरी को पकड़ने के लिए ट्रैप की योजना तैयार की।
इस तरह की कार्रवाई में शिकायतकर्ता और जांच टीम के बीच पहले से समन्वय किया जाता है, ताकि कथित रिश्वत मांगने और स्वीकार करने की घटना को कानूनी प्रक्रिया के तहत दर्ज किया जा सके।
केमिकल लगे ₹50 हजार के साथ तैयार किया गया ट्रैप
बताया जा रहा है कि एंटी करप्शन टीम ने शिकायतकर्ता को ₹50 हजार की रकम उपलब्ध कराई, जिस पर ट्रैप कार्रवाई के लिए निर्धारित रासायनिक प्रक्रिया अपनाई गई थी।
योजना के अनुसार शिकायतकर्ता रकम लेकर पेशकार के पास पहुंचा। आरोप है कि जैसे ही सुभाष चंद्र ने ₹50 हजार की रकम स्वीकार की, पहले से तैयार एंटी करप्शन टीम ने उसे पकड़ लिया।
कार्रवाई के दौरान टीम ने कथित रिश्वत की रकम को अपने कब्जे में लेकर आवश्यक प्रक्रिया पूरी की। इसके बाद आरोपी को हिरासत में ले लिया गया।
कार्रवाई के दौरान भागने की कोशिश का भी आरोप
सूत्रों के अनुसार गिरफ्तारी के दौरान आरोपी पेशकार ने एंटी करप्शन टीम की कार्रवाई का विरोध किया। आरोप है कि उसने टीम के सदस्यों के साथ धक्का-मुक्की की और वहां से निकलकर कचहरी परिसर की ओर भागने का प्रयास किया।
हालांकि, टीम के सदस्यों ने पीछा कर उसे दोबारा पकड़ लिया। घटना के कारण कचहरी परिसर में कुछ समय के लिए लोगों की भीड़ जमा हो गई और अफरा-तफरी की स्थिति बन गई।
इस संबंध में सामने आए आरोपों की पुष्टि जांच और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर होना बाकी है।
इंस्पेक्टर मोहम्मद इश्तियाक के नेतृत्व में कार्रवाई
एंटी करप्शन ब्यूरो की पूरी कार्रवाई इंस्पेक्टर मोहम्मद इश्तियाक के नेतृत्व में किए जाने की जानकारी सामने आई है।
गिरफ्तारी के बाद आरोपी को संबंधित थाने ले जाया गया, जहां उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किए जाने की प्रक्रिया शुरू की गई।
आगे की जांच में यह पता लगाया जाएगा कि रिश्वत की मांग किस स्तर पर की गई थी, रकम किसके कहने पर मांगी गई और क्या इस मामले में किसी अन्य अधिकारी या कर्मचारी की भी भूमिका थी।
डीडीसी और लेखपाल पर भी लगाए गए गंभीर आरोप
इस मामले में शिकायतकर्ता अधिवक्ता ने केवल पेशकार पर ही आरोप नहीं लगाए हैं। उन्होंने डीडीसी ओमप्रकाश अंजोर और एक संबंधित लेखपाल की भूमिका की भी जांच किए जाने की मांग की है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि रिश्वत की मांग कथित रूप से अधिकारियों के नाम पर की जा रही थी।
हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि डीडीसी और संबंधित लेखपाल के खिलाफ लगाए गए आरोप फिलहाल शिकायतकर्ता के आरोप हैं। उपलब्ध जानकारी के आधार पर इन आरोपों की स्वतंत्र या न्यायिक पुष्टि नहीं हुई है।
इसलिए यह स्पष्ट होना अभी बाकी है कि कथित रिश्वत की मांग में वास्तव में किसी अन्य अधिकारी की भूमिका थी या नहीं। इस संबंध में एंटी करप्शन ब्यूरो की जांच महत्वपूर्ण होगी।
आरोपी सुभाष चंद्र कौन है?
गिरफ्तार आरोपी सुभाष चंद्र मूल रूप से मोहल्ला हकीकत नगर, सदर कोतवाली, सहारनपुर का निवासी बताया गया है।
जानकारी के अनुसार वर्तमान में वह मुरादाबाद के नागफनी थाना क्षेत्र में किराए के मकान में रह रहा था।
वह डीडीसी कार्यालय में पेशकार के पद पर कार्यरत था और चकबंदी से संबंधित मामलों की कार्यालयी प्रक्रिया में उसकी भूमिका बताई जा रही है।
भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत क्या हो सकता है?
सरकारी कर्मचारी द्वारा किसी आधिकारिक कार्य के बदले रिश्वत मांगना या स्वीकार करना भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988, जिसमें बाद में महत्वपूर्ण संशोधन भी किए गए, के तहत गंभीर अपराध हो सकता है।
किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ रिश्वत लेने के मामले में जांच एजेंसी को यह स्थापित करना होता है कि कथित मांग और स्वीकार किए जाने की घटना किस परिस्थिति में हुई तथा उपलब्ध साक्ष्यों से आरोप किस हद तक प्रमाणित होते हैं।
केवल गिरफ्तारी का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी दोषी सिद्ध हो गया है। अंतिम दोषसिद्धि न्यायालय में साक्ष्यों और पूरी न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होती है।
आगे की जांच में किन बिंदुओं पर हो सकती है पड़ताल?
इस मामले में जांच एजेंसी द्वारा कई महत्वपूर्ण पहलुओं की पड़ताल की जा सकती है। इनमें कथित रिश्वत की मांग से संबंधित बातचीत, शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच संपर्क, कार्यालयी रिकॉर्ड, संबंधित फाइल की स्थिति तथा आदेश जारी करने और वेबसाइट पर अपलोड करने की प्रक्रिया शामिल हो सकती है।
यदि जांच में अन्य कर्मचारियों या अधिकारियों की भूमिका से संबंधित ठोस साक्ष्य सामने आते हैं, तो जांच का दायरा आगे बढ़ सकता है।
इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण होगा कि जिस मामले का आदेश लंबित था, उसमें आदेश वास्तव में कब तैयार हुआ, किस स्तर पर फाइल रुकी रही और ऑनलाइन अपलोडिंग में देरी का वास्तविक कारण क्या था।
सरकारी कार्यालयों में ट्रैप कार्रवाई क्यों महत्वपूर्ण है?
एंटी करप्शन एजेंसियों द्वारा की जाने वाली ट्रैप कार्रवाई का उद्देश्य सरकारी कामकाज में रिश्वतखोरी के मामलों पर कार्रवाई करना और शिकायतों की जांच करना होता है।
ऐसे मामलों में शिकायतकर्ता की शिकायत, प्रारंभिक सत्यापन, ट्रैप की योजना, रकम की बरामदगी और अन्य साक्ष्यों को कानूनी प्रक्रिया के तहत दर्ज किया जाता है।
मुरादाबाद की यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि आरोप सीधे चकबंदी विभाग के एक सरकारी कार्यालय में रिश्वत मांगने से जुड़ा है।
तीन महीने तक आदेश लंबित रहने का मुद्दा भी जांच के दायरे में
इस पूरे मामले में रिश्वत के आरोप के साथ-साथ आदेश के करीब तीन महीने तक लंबित रहने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है।
यदि किसी मामले में बहस पूरी हो चुकी थी और इसके बावजूद आदेश लंबे समय तक जारी नहीं हुआ, तो जांच में यह देखा जा सकता है कि फाइल किस स्तर पर लंबित थी और देरी का प्रशासनिक कारण क्या था।
यदि देरी जानबूझकर की गई थी और जांच में इसका रिश्वत की कथित मांग से संबंध स्थापित होता है, तो मामला और गंभीर हो सकता है।
कचहरी परिसर में कार्रवाई से मचा हड़कंप
एंटी करप्शन टीम की कार्रवाई की खबर फैलते ही कचहरी परिसर में बड़ी संख्या में लोगों की नजर इस घटनाक्रम पर टिक गई।
सरकारी कार्यालय में कथित रिश्वत लेते कर्मचारी की गिरफ्तारी से कर्मचारियों और अधिवक्ताओं के बीच भी चर्चा का माहौल रहा। कार्रवाई के बाद विभागीय स्तर पर भी मामले को लेकर आगे की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है।
फिलहाल जांच के परिणाम का इंतजार
फिलहाल पेशकार सुभाष चंद्र की गिरफ्तारी के बाद मामले की जांच जारी है। रिश्वत की कथित मांग में डीडीसी या लेखपाल की वास्तविक भूमिका थी या नहीं, यह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
किसी भी आरोपी के संबंध में अंतिम निष्कर्ष न्यायालय की प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जाएगा।
सागर और ज्वाला समाचार की नजर
मुरादाबाद में हुई यह कार्रवाई सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार की शिकायतों और उन पर होने वाली कार्रवाई को लेकर महत्वपूर्ण मामला बन गई है।
एक ओर जहां ₹50 हजार की कथित रिश्वत लेते पेशकार की गिरफ्तारी हुई है, वहीं दूसरी ओर शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि क्या इस कथित रिश्वतखोरी का संबंध कार्यालय के अन्य अधिकारियों या कर्मचारियों से था।
अब सबकी नजर एंटी करप्शन ब्यूरो की आगे की जांच और न्यायालय में होने वाली कानूनी कार्रवाई पर है। जांच में सामने आने वाले साक्ष्य यह तय करेंगे कि मामला केवल गिरफ्तार पेशकार तक सीमित रहता है या इसमें अन्य लोगों की भूमिका भी सामने आती है।







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