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गुरु जंभेश्वर के आदर्शों से समाज और प्रकृति के संरक्षण का संदेश, आत्मबोधोत्सवः में विद्यार्थियों को मिला प्रेरक मार्गदर्शन

प्रकृति, मानवता और नैतिक जीवन के अमर संदेशवाहक थे गुरु जंभेश्वर

मुरादाबाद के पंचायत भवन सभागार में आयोजित गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय के ‘आत्मबोधोत्सवः’ में प्रशासनिक अधिकारियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने जाना गुरु जंभेश्वर का जीवन-दर्शन, पर्यावरण संरक्षण और मानवीय मूल्यों का संदेश

मुरादाबाद। पंचायत भवन सभागार में गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ‘आत्मबोधोत्सवः’ कार्यक्रम ज्ञान, संस्कृति और भारतीय जीवन मूल्यों का प्रेरणादायी संगम बन गया। कार्यक्रम में मंडलायुक्त संगीता सिंह, जिलाधिकारी डॉ. राजेंद्र पैसिया, विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन माहेश्वरी, मुख्य विकास अधिकारी मृणाली अविनाश जोशी, कुल सचिव गिरीश द्विवेदी, एसपी सिटी कुमार रणविजय सिंह, विश्वविद्यालय के शिक्षक एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल अकादमिक शिक्षा तक सीमित न रखते हुए उन्हें भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति जागरूक करना था। वक्ताओं ने गुरु जंभेश्वर के जीवन-दर्शन को वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताते हुए कहा कि उनके सिद्धांत आज भी समाज को सही दिशा देने में सक्षम हैं।

मंडलायुक्त संगीता सिंह ने कहा कि गुरु जंभेश्वर का संदेश मानव और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करने का संदेश है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे पर्यावरण संरक्षण को केवल अभियान नहीं बल्कि जीवन का संस्कार बनाएं।

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जिलाधिकारी डॉ. राजेंद्र पैसिया ने गुरु जंभेश्वर के जीवन और उनके 29 सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि सत्य, अहिंसा, जीव-दया, स्वच्छता, अनुशासन और प्रकृति संरक्षण जैसे उनके विचार आधुनिक जीवन की बड़ी चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से इन आदर्शों को व्यवहार में उतारने का आह्वान किया।

जिलाधिकारी डॉ. राजेंद्र पैसिया ने अपने संबोधन में गुरु जंभेश्वर के जीवन एवं उनके आदर्शों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गुरु जंभेश्वर केवल एक संत या धार्मिक गुरु नहीं थे, बल्कि वे प्रकृति संरक्षण, जीव-दया, सामाजिक समरसता और नैतिक जीवन के महान प्रवर्तक थे। उन्होंने बताया कि 15वीं शताब्दी में ही गुरु जंभेश्वर ने मानव और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया था, जो आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है।

उन्होंने कहा कि गुरु जंभेश्वर द्वारा प्रतिपादित 29 सिद्धांत मानव जीवन को अनुशासित, संयमित और पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी बनाते हैं। सत्य, अहिंसा, स्वच्छता, जीवों के प्रति करुणा, हरे-भरे वृक्षों की रक्षा और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का उनका संदेश आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है।

जिलाधिकारी ने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे गुरु जंभेश्वर के आदर्शों को केवल पढ़ें ही नहीं, बल्कि उन्हें अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं। उन्होंने कहा कि यदि युवा पीढ़ी प्रकृति के प्रति संवेदनशील बने और नैतिक मूल्यों को अपनाए, तो एक स्वस्थ, समृद्ध और संस्कारित समाज का निर्माण संभव है।

कुलपति प्रो. सचिन माहेश्वरी ने कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना है जो समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझें तथा भारतीय सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करें।

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कौन थे गुरु जंभेश्वर?

गुरु जंभेश्वर, जिन्हें जाम्भोजी के नाम से भी जाना जाता है, का जन्म वर्ष 1451 ईस्वी में राजस्थान के नागौर जनपद के पीपासर गांव में हुआ था। उनके पिता लोहट पंवार और माता हांसा देवी थीं। बचपन से ही उनका स्वभाव अत्यंत शांत, चिंतनशील और आध्यात्मिक था। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा प्रकृति और पशुओं के बीच बिताया, जिससे उनके मन में सभी जीवों के प्रति करुणा और प्रकृति के प्रति गहरा लगाव विकसित हुआ।

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लगभग 34 वर्ष की आयु में उन्होंने राजस्थान के समराथल धोरा में मानव कल्याण और प्रकृति संरक्षण के उद्देश्य से बिश्नोई संप्रदाय की स्थापना की। ‘बिश्नोई’ शब्द का अर्थ है बीस और नौ, अर्थात उनके द्वारा बताए गए 29 जीवन सिद्धांत

इन सिद्धांतों में सत्य, अहिंसा, जीव-दया, पर्यावरण संरक्षण, हरे पेड़ों की रक्षा, नशामुक्त जीवन, स्वच्छता, संयम, ईश्वर भक्ति और सामाजिक सद्भाव जैसे आदर्श शामिल हैं। सदियों पहले उन्होंने यह संदेश दिया कि यदि मनुष्य प्रकृति का सम्मान करेगा, तभी उसका भविष्य सुरक्षित रहेगा।

गुरु जंभेश्वर का प्रसिद्ध संदेश “जीव दया पालनी, रूंख नहीं घावै” आज भी पर्यावरण संरक्षण का मूल मंत्र माना जाता है। इसका अर्थ है कि सभी जीवों पर दया करो और हरे वृक्षों को कभी क्षति मत पहुंचाओ।

उनके विचारों का सबसे बड़ा उदाहरण वर्ष 1730 में राजस्थान के खेजड़ली गांव में देखने को मिला, जब अमृता देवी बिश्नोई सहित 363 बिश्नोई स्त्री-पुरुषों ने खेजड़ी के वृक्षों को बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। यह घटना विश्व इतिहास में पर्यावरण संरक्षण के सबसे महान बलिदानों में गिनी जाती है और बाद के वृक्ष संरक्षण आंदोलनों के लिए प्रेरणा बनी।

गुरु जंभेश्वर ने अपने उपदेश लोकभाषा में दिए, जिन्हें ‘जंभवाणी’ के नाम से जाना जाता है। उनका निधन वर्ष 1536 ईस्वी में राजस्थान के मुकाम में हुआ, जो आज बिश्नोई समाज का प्रमुख तीर्थस्थल है।

आज, जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और पर्यावरण संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब गुरु जंभेश्वर के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देते हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि प्रकृति की रक्षा, जीवों के प्रति करुणा और नैतिक जीवन ही मानव सभ्यता के स्थायी विकास का आधार हैं।

आत्मबोधोत्सवः कार्यक्रम में उपस्थित विद्यार्थियों ने गुरु जंभेश्वर के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने तथा प्रकृति और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करने का संकल्प भी लिया।

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