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1966 का गोरक्षा आंदोलन: आखिर क्यों लाखों संतों ने घेर ली थी संसद? जानिए पूरा घटनाक्रम

लेखक परिचय

लेखक:

नीरज सोलंकी

जिला संयोजक, स्वदेशी जागरण मंच, मुरादाबाद

प्रधान संपादक, सागर और ज्वाला न्यूज

1966 का गोरक्षा आंदोलन: जब संसद के बाहर उमड़ा जनसैलाब, चली गोलियां और भारतीय राजनीति में दर्ज हो गया एक ऐतिहासिक अध्याय

सागर और ज्वाला न्यूज | विशेष शोध रिपोर्ट

नई दिल्ली। भारत के स्वतंत्रता-उपरांत इतिहास में कई ऐसे जनआंदोलन हुए जिन्होंने देश की राजनीति, समाज और शासन व्यवस्था पर गहरा प्रभाव छोड़ा। इन्हीं आंदोलनों में से एक था 7 नवंबर 1966 का गोरक्षा आंदोलन, जिसे स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े धार्मिक-जन आंदोलनों में गिना जाता है।

उस दिन देशभर से लाखों साधु-संत, किसान, गौभक्त और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि दिल्ली पहुंचे। उनकी प्रमुख मांग थी कि पूरे देश में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए संसद कानून बनाए। लेकिन संसद भवन के बाहर हालात बिगड़ गए, पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ, लाठीचार्ज हुआ और बाद में गोलीबारी भी हुई। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और आज भी यह भारतीय लोकतंत्र के सबसे चर्चित आंदोलनों में गिनी जाती है।

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भारत में गाय का धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व

भारतीय संस्कृति में गाय को केवल एक पशु नहीं, बल्कि आस्था, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार माना गया है। प्राचीन ग्रंथों, वेदों और पुराणों में गौसेवा तथा गौसंरक्षण का उल्लेख मिलता है। सदियों तक खेती, दुग्ध उत्पादन और जैविक कृषि का मुख्य आधार गाय रही।

स्वतंत्रता के बाद भी देश के अनेक सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने मांग उठाई कि पूरे भारत में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए।

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संविधान क्या कहता है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 में राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे कृषि और पशुपालन को आधुनिक एवं वैज्ञानिक आधार पर संगठित करें तथा गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू एवं भारवाही पशुओं के संरक्षण और उनकी हत्या पर रोक लगाने के लिए प्रयास करें।

हालांकि यह नीति-निर्देशक तत्व है, मौलिक अधिकार नहीं। इसलिए पूरे देश में एक समान कानून नहीं बन सका और अलग-अलग राज्यों ने अपनी परिस्थितियों के अनुसार कानून बनाए।


कैसे शुरू हुआ गोरक्षा आंदोलन?

1960 के दशक तक विभिन्न धार्मिक संगठनों, अखाड़ों, गौशालाओं, किसान संगठनों और सामाजिक संस्थाओं ने गोहत्या बंदी की मांग को तेज कर दिया।

इसके लिए सर्वदलीय गोरक्षा महाअभियान समिति का गठन किया गया। इस समिति में अनेक संत, धार्मिक नेता और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए। देशभर में सभाएं, यात्राएं और जनजागरण अभियान चलाए गए।

आंदोलन का उद्देश्य था कि केंद्र सरकार संसद में ऐसा कानून लाए जिससे पूरे देश में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लागू हो।

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7 नवंबर 1966: जब दिल्ली बना आंदोलन का केंद्र

7 नवंबर 1966 को देश के विभिन्न राज्यों से हजारों नहीं बल्कि लाखों लोग दिल्ली पहुंचे। बड़ी संख्या में साधु-संत, नागा संन्यासी, किसान, महिलाएं और गौभक्त इस प्रदर्शन में शामिल हुए।

रामलीला मैदान और अन्य स्थानों पर एकत्र होने के बाद विशाल जुलूस संसद भवन की ओर बढ़ा। प्रदर्शनकारी शांतिपूर्वक अपनी मांग सरकार तक पहुंचाना चाहते थे।

प्रत्यक्षदर्शियों और विभिन्न ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार भीड़ लगातार बढ़ती गई और संसद भवन के आसपास भारी तनाव का माहौल बन गया।


कैसे बिगड़े हालात?

जैसे-जैसे प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़े, पुलिस ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। बैरिकेड लगाए गए। कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हुई।

इसके बाद स्थिति तेजी से बिगड़ी। पुलिस ने पहले लाठीचार्ज किया। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े गए।

जब हालात नियंत्रण से बाहर होने लगे तो कई स्थानों पर पुलिस द्वारा गोली चलाने की घटनाएं भी सामने आईं।

गोलीबारी में कितने लोगों की मृत्यु हुई, इस पर आज भी मतभेद हैं। सरकारी आंकड़ों और आंदोलनकारी संगठनों के दावों में अंतर बताया जाता है। विभिन्न स्रोत अलग-अलग संख्या बताते हैं, इसलिए किसी एक संख्या पर सर्वसम्मति नहीं है।


घटना के बाद पूरे देश में आक्रोश

दिल्ली की घटना की खबर पूरे देश में फैल गई। अनेक राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए। संत समाज ने इसे धार्मिक भावनाओं पर आघात बताया।

देशभर के अनेक मंदिरों, आश्रमों और धार्मिक संस्थाओं में श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की गईं। गौसंरक्षण का मुद्दा राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया।


महात्मा रामचंद्र वीर का अनशन

आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक महात्मा रामचंद्र वीर ने गोहत्या बंदी की मांग को लेकर लंबा आमरण अनशन किया।

उनका अनशन उस समय देशभर में चर्चा का विषय बना। अनेक संतों, धार्मिक संगठनों और समाजसेवियों ने उनके समर्थन में अभियान चलाया। यह अनशन गोरक्षा आंदोलन के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।


सरकार की प्रतिक्रिया

उस समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। केंद्र सरकार ने संसद में पूरे देश के लिए गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाला कानून नहीं बनाया।

हालांकि आंदोलन के बाद यह विषय राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया। कई राज्यों ने अपने-अपने कानूनों की समीक्षा की और अनेक राज्यों में गोहत्या निषेध कानूनों को और अधिक सख्त किया गया।


क्या वास्तव में संतों ने श्राप दिया था?

1966 की घटना के बाद कई धार्मिक मंचों और जनश्रुतियों में यह कहा गया कि कुछ संतों ने तत्कालीन सरकार को चेतावनी दी थी कि गौमाता और संतों पर हुए अत्याचार का दुष्परिणाम भविष्य में देखने को मिलेगा।

हालांकि इस दावे के समर्थन में कोई आधिकारिक सरकारी दस्तावेज या सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इतिहासकार इसे धार्मिक मान्यता और लोकविश्वास के रूप में देखते हैं, न कि स्थापित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में।


आज भी क्यों याद किया जाता है यह आंदोलन?

इतिहासकारों का मानना है कि यह आंदोलन केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं था। इसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि, पशुपालन और भारतीय सांस्कृतिक पहचान जैसे विषय भी जुड़े हुए थे।

इस आंदोलन के बाद गौसंरक्षण राष्ट्रीय राजनीति का स्थायी मुद्दा बन गया और आज भी समय-समय पर इस विषय पर बहस होती रहती है।


इतिहास से मिलने वाला संदेश

1966 का गोरक्षा आंदोलन यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र में जनता की भावनाओं, धार्मिक आस्थाओं और शांतिपूर्ण आंदोलनों के प्रति संवेदनशील रहना आवश्यक है। संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति होती है।

यह आंदोलन भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है जिसे अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखा जाता है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इसने देश की राजनीति, समाज और सार्वजनिक विमर्श पर गहरा प्रभाव छोड़ा।


संपादकीय टिप्पणी

इस विशेष रिपोर्ट में ऐतिहासिक घटनाओं, उपलब्ध अभिलेखों तथा विभिन्न पक्षों के सार्वजनिक दावों का संतुलित उल्लेख किया गया है। जिन विषयों पर इतिहासकारों में मतभेद हैं या जो धार्मिक जनश्रुतियों पर आधारित हैं, उन्हें प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।

(यह विशेष लेख ऐतिहासिक घटनाओं, उपलब्ध तथ्यों, जनश्रुतियों एवं सामाजिक विमर्श पर आधारित है। लेख में उल्लिखित धार्मिक मान्यताएं और लोकविश्वास लेखक के अध्ययन एवं समाज में प्रचलित चर्चाओं के संदर्भ में प्रस्तुत किए गए हैं।)

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