President Draupadi Murmu सोमवार को प्रयागराज के महाकुंभ मेला में पहुंचीं और त्रिवेणी संगम में पवित्र स्नान किया। यह क्षण देशवासियों के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुआ, जब देश की पहले नागरिक ने संगम में स्नान कर सनातन धर्म को मजबूत किया। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उनके साथ थे। राष्ट्रपति ने संगम क्षेत्र में पहुंचने के बाद त्रिवेणी संगम में स्नान किया और सनातन धर्म को एक नई दिशा देने का संदेश दिया।
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Toggleराष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का स्वागत
प्रयागराज के महाकुंभ मेला में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का स्वागत राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया। यह मेला 13 जनवरी से शुरू हुआ था और हर वर्ष की तरह इस बार भी लाखों श्रद्धालु इस महासंस्कार में भाग लेने के लिए यहां पहुंचे हैं। राष्ट्रपति मुर्मू के संगम में स्नान करने से यह मेला और भी खास बन गया है। राष्ट्रपति के इस कदम ने केवल धार्मिक महत्व को ही बढ़ाया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि सनातन धर्म की जड़ें आज भी मजबूत हैं और उन्हें जीवित रखा जाएगा।
पवित्र स्नान और प्रार्थना
राष्ट्रपति मुर्मू ने त्रिवेणी संगम में पवित्र स्नान किया, जो गंगा, यमुन और सरस्वती नदियों के संगम स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। स्नान के बाद उन्होंने वहां खड़े होकर प्रार्थना की और देश की समृद्धि और सुख-शांति की कामना की। यह ऐतिहासिक क्षण था, जब देश के पहले नागरिक ने इस पवित्र स्थल पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और वहां की अद्वितीय धार्मिक और सांस्कृतिक महिमा का सम्मान किया।
VIDEO | Maha Kumbh 2025: President Droupadi Murmu (@rashtrapatibhvn), along with UP Governor Anandiben Patel (@anandibenpatel) and CM Yogi Adityanath (@myogiadityanath) , boards a boat to reach Triveni Sangam, Prayagraj. #MahaKumbhWithPTI
(Full video available on PTI Videos -… pic.twitter.com/OXPatiiUAV
— Press Trust of India (@PTI_News) February 10, 2025
महाकुंभ मेला और इसका महत्व
महाकुंभ मेला, जो कि दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है, प्रत्येक बार लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। इस बार 13 जनवरी को शुरू हुए इस मेले में भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर से श्रद्धालु हिस्सा लेने पहुंचे हैं। महाकुंभ का आयोजन हर 12 साल में प्रयागराज में होता है और यह एक विशेष धार्मिक अवसर होता है, जो भारत की प्राचीन धार्मिक परंपराओं का प्रतीक है।
महाकुंभ मेला न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और परंपरा का भी एक अहम हिस्सा है, जो पूरी दुनिया में भारतीय धर्म और संस्कृति का प्रचार करता है। इस मेले में न केवल साधू-संत, बल्कि आम जनता भी शिरकत करती है, जो इस अवसर पर अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए पवित्र स्नान करती है और आस्था की शक्ति को महसूस करती है।
राष्ट्रपति के कार्यक्रम
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने त्रिवेणी संगम में स्नान के बाद कई और धार्मिक स्थलों का दौरा किया। राष्ट्रपति ने अक्षयवट और हनुमान मंदिर का भी दर्शन किया, जो यहां के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल हैं। इसके साथ ही राष्ट्रपति ने “डिजिटल कुंभ एक्सपीरियंस सेंटर” का भी दौरा किया, जो इस समय के महाकुंभ के नए तकनीकी पहलुओं को दर्शाता है। यह सेंटर श्रद्धालुओं को कुंभ मेला के इतिहास, महत्त्व और आयोजन से जुड़ी जानकारी डिजिटल माध्यम से प्रदान करता है।
राष्ट्रपति मुर्मू का यह दौरा न केवल एक धार्मिक यात्रा थी, बल्कि इससे यह संदेश भी गया कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखना और उन्हें हर पीढ़ी तक पहुंचाना हमारा कर्तव्य है।
महाकुंभ का समापन और धार्मिक महत्व
महाकुंभ मेला 26 फरवरी को महाशिवरात्रि के अवसर पर समाप्त होगा। यह आयोजन विश्वभर के लाखों श्रद्धालुओं के लिए एक अद्भुत अनुभव होता है, जो इस मौके पर पवित्र संगम में स्नान कर अपनी आत्मा को शुद्ध करते हैं। इस महाकुंभ में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान, संतों की उपस्थिति, और श्रद्धालुओं का जोश व आस्था, सभी कुछ मिलकर इसे एक ऐतिहासिक घटना बनाते हैं।
महाकुंभ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता, संस्कृति और आस्था का प्रतीक है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का इस पवित्र स्थल पर पवित्र स्नान करना और इस मेला में शामिल होना भारतीय समाज और संस्कृति के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। यह क्षण न केवल इस मेले के महत्व को दर्शाता है, बल्कि यह भी प्रमाणित करता है कि सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति आज भी जीवित और प्रभावी है।
इस ऐतिहासिक मौके पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने न केवल अपने पद की गरिमा को बढ़ाया, बल्कि भारतीय संस्कृति और धार्मिक विश्वासों को भी प्रोत्साहित किया। महाकुंभ का यह आयोजन और राष्ट्रपति का यहां आना, भारतीय समाज की एकता, विविधता और धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक है।


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