17 दिन बाद बड़ा घटनाक्रम: ई-पंजीकरण संबंधी परिपत्र वापस, अधिवक्ताओं के आंदोलन को मिली बड़ी सफलता

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Toggleमहा निरीक्षक निबंधन का आदेश जारी, 4 जून का ई-पंजीकरण परिपत्र वापस लेने के निर्देश
17 दिनों तक चले संघर्ष के बाद अधिवक्ताओं, दस्तावेज लेखकों एवं स्टाम्प विक्रेताओं में खुशी की लहर
सागर और ज्वाला विशेष | मुरादाबाद/बिलारी | 29 जून

उत्तर प्रदेश सरकार की प्रस्तावित ई-पंजीकरण व्यवस्था, रजिस्ट्री कार्यों के निजीकरण तथा प्रस्तावित मानकीकृत मूल्य सूची के विरोध में पिछले 17 दिनों से चल रहे अधिवक्ताओं के आंदोलन के बीच सोमवार को एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया।
महानिरीक्षक निबंधन, उत्तर प्रदेश, लखनऊ की ओर से 29 जून 2026 को जारी आदेश में 4 जून 2026 के ई-पंजीकरण संबंधी परिपत्र संख्या–2523 को वापस लेने के निर्देश जारी किए गए हैं। आदेश सामने आने के बाद आंदोलनरत अधिवक्ताओं, दस्तावेज लेखकों तथा स्टाम्प विक्रेताओं के बीच उत्साह और संतोष का वातावरण देखा गया।
यह घटनाक्रम न केवल आंदोलनरत पक्षों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि प्रदेश की प्रशासनिक एवं न्यायिक कार्यप्रणाली के संदर्भ में भी इसे एक उल्लेखनीय निर्णय के रूप में देखा जा रहा है।
आदेश में क्या कहा गया?
जारी आदेश के अनुसार, उत्तर प्रदेश ऑनलाइन दस्तावेज पंजीकरण नियमावली, 2024 के अंतर्गत लागू किए जाने वाले ई-पंजीकरण मॉड्यूल संबंधी 4 जून 2026 के परिपत्र पर पुनर्विचार किया गया और उसे वापस लेने का निर्णय लिया गया है।
इसके साथ ही प्रदेश के सभी अपर महानिरीक्षक निबंधन, सहायक महानिरीक्षक निबंधन, जिलाधिकारी, अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) तथा उप निबंधकों को आवश्यक कार्रवाई एवं आदेश के अनुपालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
यह आदेश सामने आने के बाद अधिवक्ता संगठनों ने इसे अपने लंबे संघर्ष और लोकतांत्रिक तरीके से उठाई गई मांगों की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा है।
17 दिन तक चला संघर्ष, लगातार जारी रहा विरोध
दि बार एसोसिएशन एंड लाइब्रेरी के नेतृत्व में मुरादाबाद सहित उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों में अधिवक्ता, दस्तावेज लेखक एवं स्टाम्प विक्रेता लगातार आंदोलन कर रहे थे।
मुरादाबाद में बार एसोसिएशन के अध्यक्ष आनंद मोहन गुप्ता एवं महासचिव कुलदीप गुप्ता के नेतृत्व में प्रतिदिन धरना-प्रदर्शन आयोजित किया गया। आंदोलन में बड़ी संख्या में वरिष्ठ एवं युवा अधिवक्ताओं ने भाग लेकर प्रस्तावित व्यवस्था को वापस लेने की मांग उठाई।
आंदोलन के दौरान अधिवक्ताओं ने यह तर्क रखा कि नई व्यवस्था से पारंपरिक रजिस्ट्री प्रक्रिया, संबंधित पेशों तथा आम नागरिकों की सुविधा पर प्रभाव पड़ सकता है। इसी कारण आंदोलन को लगातार व्यापक समर्थन मिलता रहा।
मुख्यमंत्री तक पहुंचाने का प्रयास, आंदोलन ने लिया गंभीर रूप
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुरादाबाद दौरे के दौरान बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने जिला प्रशासन के माध्यम से मुख्यमंत्री से मुलाकात का समय भी मांगा था। उद्देश्य था कि अधिवक्ता समाज की चिंताओं और मांगों को सीधे सरकार के समक्ष रखा जा सके। हालांकि कार्यक्रम की व्यस्तता के कारण मुलाकात संभव नहीं हो सकी।
इसके बाद आंदोलन और तेज हुआ तथा अधिवक्ता अभिनव भट्ट आमरण अनशन पर बैठ गए। इस घटनाक्रम ने आंदोलन को प्रदेश स्तर पर अधिक गंभीर और चर्चित बना दिया।
प्रदेशव्यापी आंदोलन का दिखा असर
मुरादाबाद के साथ-साथ मेरठ, गौतमबुद्ध नगर (नोएडा), मऊ, शामली, आगरा, हाथरस सहित प्रदेश के अनेक जिलों में अधिवक्ताओं ने कार्य बहिष्कार करते हुए धरना-प्रदर्शन किया।
आंदोलनकारी संगठनों का दावा था कि रजिस्ट्री कार्यों के प्रभावित होने से सरकार के राजस्व पर प्रतिदिन करोड़ों रुपये का असर पड़ रहा है। हालांकि इस संबंध में सरकार की ओर से कोई आधिकारिक राजस्व आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया।
इसके बावजूद आंदोलन लगातार चर्चा का विषय बना रहा और प्रदेश के विभिन्न अधिवक्ता संगठनों ने इसे समर्थन दिया।
क्या अब समाप्त होगा आंदोलन?
ई-पंजीकरण संबंधी परिपत्र वापस लेने के आदेश के बाद अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि प्रदेशभर के निबंधन कार्यालयों में इसका वास्तविक अनुपालन किस प्रकार किया जाएगा।
साथ ही यह भी देखा जाएगा कि अधिवक्ता संगठन आंदोलन समाप्त करने या आगे की रणनीति को लेकर क्या निर्णय लेते हैं।
आने वाले दिनों में सरकार और संबंधित संगठनों के बीच संवाद की दिशा इस पूरे मामले की अगली स्थिति तय कर सकती है।
लोकतंत्र, संवाद और सहभागिता पर बड़ा संदेश
यह घटनाक्रम केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संवाद की प्रक्रिया का भी महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।
किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पहले उससे जुड़े सभी पक्षों—अधिवक्ताओं, दस्तावेज लेखकों, स्टाम्प विक्रेताओं और आम नागरिकों—से संवाद स्थापित करना नीति निर्माण की महत्वपूर्ण आवश्यकता माना जाता है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि व्यापक सहभागिता से लागू की गई व्यवस्थाएं अधिक प्रभावी और विवाद रहित होती हैं।
सागर और ज्वाला की प्रतिक्रिया
17 दिनों तक चले शांतिपूर्ण संघर्ष के बाद यदि ई-पंजीकरण संबंधी परिपत्र वापस लिया गया है, तो इसे केवल अधिवक्ता समाज की सफलता के रूप में नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में भी देखा जा सकता है।
सागर और ज्वाला का मानना है कि किसी भी प्रशासनिक सुधार का उद्देश्य सुविधा और पारदर्शिता होना चाहिए, लेकिन उससे जुड़े सभी पक्षों की चिंताओं को भी समान महत्व मिलना आवश्यक है।
यह घटनाक्रम इस बात का संकेत देता है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण, अनुशासित और संवैधानिक तरीकों से अपनी बात रखने की परंपरा आज भी प्रभावी है।
यदि सरकार ने पुनर्विचार करते हुए संबंधित परिपत्र वापस लिया है, तो इसे संवाद आधारित प्रशासन की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है।
अब आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और अधिवक्ता संगठनों के बीच विश्वास, संवाद और सहयोग का वातावरण आगे भी बना रहे, ताकि भविष्य में न्याय व्यवस्था से जुड़े किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय पर सभी हितधारकों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके और आम जनता को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।
संपादकीय टिप्पणी
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती केवल निर्णय लेने में नहीं बल्कि समय आने पर उन निर्णयों पर पुनर्विचार करने की क्षमता में भी दिखाई देती है। संवाद, सहभागिता और पारदर्शिता—ये तीनों किसी भी सफल प्रशासनिक व्यवस्था के आधार हैं।
जनभावनाओं का सम्मान और न्याय व्यवस्था की गरिमा, दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
“संवाद से समाधान निकलता है, टकराव से नहीं।”







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