नित्य प्रेरणा: फासीवाद – समाजवाद का स्वरूप
जब हम सोचते हैं कि हमारे काम और इच्छा का दुनिया पर प्रभाव होना चाहिए, तब हम सोचते हैं कि यह हमारे राष्ट्रीय जीवन के स्वरूप को कैसे प्रभावित करेगा, क्या हमने ऐसी कोई तस्वीर बनाई है? अलग-अलग लोगों के पास जीवन की अलग-अलग संकल्पनाएं होती हैं अर्थात वे स्वयं को कैसा बनाना चाहते हैं, जो उनकी विचारधारा पर आधारित होती हैं। कुछ लोग यह सोचने की भी परवाह नहीं करते कि यह कितना व्यावहारिक है, लेकिन हमें करना चाहिए। कुछ लोग समाजवाद या साम्यवाद के आधार पर भविष्य के समाज का खाका खींचते हैं। उनकी तस्वीर में संस्कृति या आध्यात्मिक आधार के लिए कोई जगह नहीं है। ऐसा नहीं है कि लोगों को इन खामियों का एहसास नहीं है, फिर भी वे इन विचारधाराओं की ओर आकर्षित होते हैं।
लोग किसी नारे से आकर्षित होते हैं। उदाहरण के लिए, कई लोगों ने हमें ‘फासीवादी’ कहा। एक सज्जन से जब पूछा गया, तो वे इसका अर्थ नहीं बता पाए। उन्होंने आगे कबूल किया कि ऐसा कहने वाले कई लोग इसका अर्थ नहीं समझते। छोटे बच्चे कई तरह की गालियाँ बोलते हैं, लेकिन उनका अर्थ नहीं जानते। ‘फासीवाद’ का मौलिक विचार बुरा है या नहीं है इसका वहां के परिपेक्ष में विचार करना होगा जहां से यह आया है, यह समाज की शक्ति द्वारा स्थापित आर्थिक संरचना का एक रूप है। लेकिन हिंदू संस्कृति के विचार में इस विचार का कोई स्थान नहीं है। नेशनल सोशलिस्ट ने ‘नाज़ी’ (हिटलर-मार्ग) नारे को जन्म दिया। ‘नाज़ी’ शब्द नेशनलिस्ट के ‘ना’ और सोशलिस्ट के ‘जा’ से बना है। इस तरह के कई संक्षिप्त रूप बने, जैसे INTUC। यह इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस का संक्षिप्त रूप है, UNO का मतलब है यूनाइटेड नेशंस ऑर्गनाइजेशन। इसी तरह ‘नाज़ीवाद’ समाजवाद का ही एक रूप है। ‘नाज़ीवाद’ कुछ और नहीं बल्कि आय के सभी स्रोतों का एक जगह पर केंद्रित होना है। इसमें कुछ अच्छा या बुरा हो सकता है। हर सिद्धांत की अपनी विशेषताएँ, पक्ष और विपक्ष होते हैं। लेकिन आज जो लोग फासीवाद की राह पर चल रहे हैं, वे दूसरों को ‘फासीवादी’ सिर्फ़ एक रक्षात्मक हथियार के तौर पर कहते हैं। अपना हिंदू चिंतन ही विश्व के सभी विचारों से अच्छी बातें ग्रहण करने की अनुमति देता है, और यही बात भारत को विशेष बनाती है।
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