अक्षय तृतीया पर बन रहा दुर्लभ संयोग, सूर्य-चंद्रमा और शनि उच्च राशि में विराजमान होकर देंगे फल : आचार्य ऋतुपर्ण दीपक
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Toggleसौरभ मिश्र, सागर और ज्वाला न्यूज
चन्दौसी -सनातन धर्म में अक्षय तृतीया का पर्व बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दिन मांगलिक कार्य करना बेहद शुभ माना जाता है. श्रीमद् भागवत प्रवक्ता आचार्य ऋतुपर्ण शर्मा ने कहा ऐसा माना जाता है कि अक्षय तृतीया के दिन भगवान परशुराम का जन्म और त्रेता की शुरुआत हुई थी. साथ ही इसे धनतेरस के रूप में मनाए जाने की परंपरा भी है. इस दिन सनातन धर्म को मानने वाले लोग सोने चांदी जैसे आभूषण की खरीदारी भी करते हैं. हिंदू पंचांग के मुताबिक प्रत्येक वर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाता है. इस वर्ष यह पर्व 10 मई को मनाया जाएगा. इस दिन सूर्य, शनि और चंद्रमा उच्च राशि में विराजमान होकर शुभ फल भी देंगे. इस विषय पर श्रीमद् भागवत कथा प्रवक्ता आचार्य ऋतुपर्ण शर्मा ने बताया कि कि अक्षय तृतीया का पर्व इस वर्ष 10 मई को मनाया जाएगा. इतना ही नहीं 10 मई को प्रातः 4ः57 बजे से तृतीया तिथि की शुरुआत होगी, जो 11 मई रात्रि 2ः50 पर खत्म होगी. इस दिन प्रात काल 10ः45 बजे तक रोहिणी नक्षत्र उसके बाद मृगशिरा नक्षत्र रहेगा. इसके अलावा चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में तो सूर्य मेष राशि में तथा शनि देव कुंभ राशि में रहते हुए फल प्रदान करेंगे. इसके अलावा इस दिन कई दुर्लभ संयोग का निर्माण भी हो रहा है. जिसमें गजकेसरी योग और शश योग बन रहा है .अक्षय तृतीया के दिन माता लक्ष्मी की पूजा आराधना करने का विधान है. इस दिन प्रातः काल उठकर गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करना चाहिए. पीला अथवा सफेद वस्त्र धारण करके मंदिर की सफाई करनी चाहिए. उसके बाद एक चौकी पर पीला वस्त्र डालकर गंगाजल से पवित्र कर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करनी चाहिए. धूप और दीप अर्पित करने चाहिए. भगवान विष्णु को रोली, कुमकुम, फूल, मेवा, पान सुपारी और फल अर्पित करना चाहिए. उसके बाद पूजा आराधना शुरू करनी चाहिए. पूजा आराधना करने के बाद आरती करनी चाहिए और भोग लगाना चाहिए. ऐसा करने से सौभाग्यशाली बनने का आशीर्वाद प्राप्त होता है.


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