सीटीओ ने नहीं उठाया विधायक का फोन, विधानसभा अध्यक्ष से शिकायत
कुंदरकी विधायक रामवीर सिंह ने कोषाधिकारी पर लगाए गंभीर आरोप, कार्रवाई की मांग; प्रशासनिक कार्यशैली पर उठे सवाल
मुरादाबाद। कुंदरकी विधानसभा क्षेत्र के विधायक रामवीर सिंह द्वारा मुख्य कोषाधिकारी (सीटीओ) पर लगातार फोन न उठाने का आरोप लगाए जाने के बाद यह मामला अब प्रशासनिक गलियारों से निकलकर सोशल मीडिया और जनमानस में चर्चा का विषय बन गया है। विधायक ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर मुख्य कोषाधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है।
Table of Contents
Toggleविधायक रामवीर सिंह का आरोप है कि उन्होंने जनसमस्याओं और विभागीय कार्यों के संबंध में मुख्य कोषाधिकारी से संपर्क करने के लिए दो अलग-अलग मोबाइल नंबरों से कुल सात बार फोन किया, लेकिन एक बार भी उनका फोन नहीं उठाया गया। उनका कहना है कि इससे पहले भी कई बार संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन अधिकारी की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
विधानसभा अध्यक्ष को भेजे गए पत्र में विधायक ने उल्लेख किया है कि वह विधानसभा की प्राक्कलन समिति के सदस्य हैं तथा नियमित रूप से क्षेत्र की जनता की समस्याओं के समाधान के लिए जनसुनवाई करते हैं। ऐसे में विभिन्न विभागों के अधिकारियों से निरंतर संवाद आवश्यक होता है। उनका कहना है कि यदि अधिकारी जनप्रतिनिधियों के फोन तक नहीं उठाएंगे तो आम जनता की समस्याओं का समयबद्ध समाधान कैसे होगा।
उधर मुख्य कोषाधिकारी कार्यालय की ओर से बताया गया है कि संबंधित अधिकारी अवकाश पर हैं। हालांकि विधायक का कहना है कि यदि अधिकारी अवकाश पर थे तो इसकी सूचना पहले से दी जानी चाहिए थी अथवा किसी वैकल्पिक अधिकारी को जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए थी, ताकि आवश्यक सरकारी कार्य प्रभावित न हों।
लापता व्यक्ति की सूचना पर पुलिस नहीं कर सकती इंतजार, सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश
उक्त घटना के बाद से सोशल मीडिया एवं जनमानस में यह मामला लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि जब क्षेत्र का निर्वाचित जनप्रतिनिधि ही संबंधित अधिकारी से संपर्क नहीं कर पा रहा है, तो आम नागरिकों की समस्याओं का समाधान किस प्रकार होता होगा।
संपादकीय टिप्पणी
संवादहीनता प्रशासनिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं
सागर और ज्वाला की टिप्पणी
कुंदरकी विधायक रामवीर सिंह और मुख्य कोषाधिकारी के बीच संवादहीनता का यह मामला केवल एक जनप्रतिनिधि और अधिकारी के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक कार्यशैली, जवाबदेही और जनसेवा के प्रति संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
आज के डिजिटल युग में मोबाइल फोन केवल बातचीत का साधन नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन का सबसे प्रभावी माध्यम बन चुका है। शासन के अधिकांश निर्देश, समन्वय और जनसमस्याओं के त्वरित समाधान की प्रक्रिया अब मोबाइल संचार पर ही आधारित है। ऐसे में यदि कोई अधिकारी बार-बार किए गए फोन का उत्तर नहीं देता, तो यह स्वाभाविक रूप से उसकी कार्यशैली और जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है।
सागर और ज्वाला का मानना है कि जनप्रतिनिधि किसी अधिकारी को निजी कारणों से नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं के समाधान के लिए फोन करते हैं। ऐसे में उनके फोन की उपेक्षा करना अप्रत्यक्ष रूप से जनता की आवाज को अनसुना करने जैसा प्रतीत होता है।
यह भी विचारणीय प्रश्न है कि आज के दौर में कुछ अधिकारी फोन पर बात करने से बचते क्यों हैं? यदि वे किसी बैठक, निरीक्षण या अवकाश पर हैं तो बाद में कॉल बैक करना या एक संक्षिप्त संदेश देकर स्थिति स्पष्ट करना प्रशासनिक शिष्टाचार का हिस्सा होना चाहिए। संवाद से बचना किसी भी दृष्टि से सुशासन का परिचायक नहीं माना जा सकता।
यदि अधिकारी जनप्रतिनिधियों से संवाद करने में ही रुचि नहीं दिखाएंगे तो आम नागरिकों की शिकायतों और समस्याओं के समाधान की गति पर भी स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठेंगे। लोकतंत्र में अधिकारी और जनप्रतिनिधि दोनों जनता के प्रति जवाबदेह हैं। दोनों के बीच बेहतर समन्वय और संवाद ही सुशासन की पहचान है।
सागर और ज्वाला का स्पष्ट मत है कि किसी भी अधिकारी की कार्यशैली का मूल्यांकन केवल फाइलों के निस्तारण से नहीं, बल्कि उसकी उपलब्धता, संवाद क्षमता और जनता के प्रति संवेदनशील व्यवहार से भी होना चाहिए। फोन न उठाना, संपर्क से बचना या संवादहीनता की संस्कृति विकसित करना प्रशासनिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है। शासन को ऐसी कार्यप्रणाली पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, ताकि जनता और जनप्रतिनिधियों का प्रशासन पर विश्वास और अधिक मजबूत हो सके।







Users Today : 0
Users Last 30 days : 29
Total Users : 25221
Total views : 47646