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मुख्तार अंसारी के खिलाफ LMG बरामद कर POTA लगाने वाले DSP शैलेंद्र सिंह की पूरी कहानी: नौकरी छोड़ी, जेल गए और 17 साल बाद वापस हुआ मुकदमा

मुख्तार अंसारी के खिलाफ LMG बरामद कर POTA लगाने वाले DSP शैलेंद्र सिंह की पूरी कहानी: नौकरी छोड़ी, जेल गए और 17 साल बाद वापस हुआ मुकदमा

कभी माफिया के खिलाफ कार्रवाई से सुर्खियों में आए थे शैलेंद्र सिंह, आज खेती और गौसेवा से जुड़े हैं

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के अपराध और राजनीति के इतिहास में वर्ष 2004 की एक घटना आज भी खास तौर पर याद की जाती है। यह वह दौर था जब पूर्वांचल में मुख्तार अंसारी का राजनीतिक और आपराधिक प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था। इसी दौरान उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की वाराणसी यूनिट में तैनात तत्कालीन डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह ने एक ऐसी कार्रवाई की, जिसने प्रदेश की राजनीति से लेकर पुलिस महकमे तक हलचल पैदा कर दी।

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जनवरी 2004 में STF ने एक लाइट मशीन गन (LMG) और करीब 200 कारतूस बरामद किए। इस कार्रवाई के बाद मामले की जांच का संबंध मुख्तार अंसारी से जोड़ा गया और उसके खिलाफ Prevention of Terrorism Act यानी POTA के तहत कार्रवाई की गई।

इस कार्रवाई के बाद घटनाक्रम तेजी से बदला। शैलेंद्र सिंह ने बाद में आरोप लगाया कि उन पर मुख्तार अंसारी के खिलाफ की गई कार्रवाई को कमजोर करने और उसका नाम हटाने का दबाव बनाया गया। उन्होंने कार्रवाई वापस लेने से इनकार किया और फरवरी 2004 में पुलिस सेवा से इस्तीफा दे दिया।

इसके कुछ महीनों बाद उनके खिलाफ वाराणसी में एक अलग आपराधिक मुकदमा दर्ज हुआ। उन्हें गिरफ्तार किया गया और जेल भी जाना पड़ा। करीब 17 वर्ष बाद, 2021 में योगी आदित्यनाथ सरकार के कार्यकाल में इस मामले को वापस लेने की प्रक्रिया पूरी हुई और वाराणसी की अदालत ने अभियोजन वापस लेने की अनुमति दी।

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आज शैलेंद्र सिंह पुलिस सेवा में नहीं हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार वह लखनऊ क्षेत्र में जैविक खेती, गौशाला और पशुपालन से जुड़े काम कर रहे हैं।


जनवरी 2004: LMG की बरामदगी से शुरू हुआ पूरा घटनाक्रम

वर्ष 2004 में शैलेंद्र सिंह उत्तर प्रदेश STF की वाराणसी यूनिट के प्रभारी डिप्टी एसपी थे। उस समय STF को पूर्वांचल में सक्रिय आपराधिक गिरोहों की गतिविधियों पर नजर रखने की जिम्मेदारी दी गई थी।

विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार STF को एक संदिग्ध फोन बातचीत की जानकारी मिली थी। इस बातचीत में कथित तौर पर एक LMG की खरीद के लिए करीब एक करोड़ रुपये की डील की चर्चा सामने आई थी।

जांच आगे बढ़ी तो STF ने वाराणसी के चौबेपुर क्षेत्र में कार्रवाई की। 25 जनवरी 2004 को दो लोगों को गिरफ्तार किए जाने और उनके पास से LMG तथा लगभग 200 जिंदा कारतूस बरामद किए जाने की रिपोर्ट सामने आई।

इस बरामदगी के बाद चौबेपुर थाने में मामले दर्ज किए गए। रिपोर्टों के अनुसार एक मामला Arms Act के तहत और दूसरा POTA के तहत दर्ज किया गया।

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जांच में जिस मोबाइल नंबर का इस्तेमाल कथित LMG सौदे में हुआ था, उसका संबंध मुख्तार अंसारी के करीबी व्यक्ति से जोड़े जाने की बात भी सामने आई। इसके बाद पुलिस ने मामले को मुख्तार अंसारी से जोड़ते हुए उसके खिलाफ POTA के तहत कार्रवाई की।


LMG किसके लिए खरीदी जा रही थी?

इस मामले का सबसे गंभीर पहलू LMG की कथित खरीद का उद्देश्य था।

शैलेंद्र सिंह ने बाद में कई मीडिया इंटरव्यू में दावा किया कि यह हथियार तत्कालीन भाजपा विधायक कृष्णानंद राय को निशाना बनाने के लिए हासिल किया जा रहा था। उनका कहना था कि सामान्य हथियारों से कृष्णानंद राय की बुलेटप्रूफ गाड़ी को निशाना बनाना मुश्किल था और इसी वजह से LMG की जरूरत महसूस की गई थी।

हालांकि, इस पूरे हिस्से को शैलेंद्र सिंह के बयान और उस समय की जांच से जुड़े दावों के रूप में ही प्रस्तुत करना उचित है। इसे बिना न्यायिक संदर्भ के अंतिम रूप से स्थापित तथ्य के तौर पर लिखना सही नहीं होगा।


मुख्तार अंसारी पर POTA लगाने के बाद मचा राजनीतिक तूफान

LMG की बरामदगी के बाद शैलेंद्र सिंह ने मुख्तार अंसारी के खिलाफ POTA की कार्रवाई की। उस समय POTA देश का बेहद कड़ा आतंकवाद विरोधी कानून था।

इस कार्रवाई के बाद मामला केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा। राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी इसकी चर्चा होने लगी।

शैलेंद्र सिंह ने वर्षों बाद दिए अपने बयानों में आरोप लगाया कि मुख्तार अंसारी के खिलाफ POTA की कार्रवाई के बाद उन पर दबाव बढ़ गया था। उनका दावा था कि तत्कालीन सरकार चाहती थी कि मामले को कमजोर किया जाए और मुख्तार अंसारी का नाम कार्रवाई से हटाया जाए।

यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है: तत्कालीन सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने का आरोप मुख्य रूप से शैलेंद्र सिंह के अपने सार्वजनिक बयानों पर आधारित है। इसे न्यायालय द्वारा प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं बल्कि शैलेंद्र सिंह के आरोप के रूप में लिखा जाना चाहिए।


दस दिन में तबादला और फिर पुलिस सेवा से इस्तीफा

शैलेंद्र सिंह के अनुसार कार्रवाई के बाद उनके ऊपर दबाव बढ़ता गया। 2024 में मुख्तार अंसारी की मौत के बाद दिए इंटरव्यू में उन्होंने फिर दावा किया कि तत्कालीन सरकार मुख्तार अंसारी को बचाना चाहती थी।

उनके अनुसार वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर भी बदलाव हुए और अंततः उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।

कुछ रिपोर्टों में उनके इस्तीफे को फरवरी 2004 से जोड़ा गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने फरवरी 2004 में पुलिस सेवा से इस्तीफा दिया था।

शैलेंद्र सिंह ने बाद में यह भी कहा कि उन्होंने अपने इस्तीफे में कार्रवाई को लेकर अपनी आपत्ति और परिस्थितियों का उल्लेख किया था।


इस्तीफे के बाद जेल क्यों गए शैलेंद्र सिंह?

यह पूरी कहानी का वह हिस्सा है जिसे अक्सर सोशल मीडिया पर गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।

कई बार ऐसा दावा किया जाता है कि मुख्तार अंसारी पर POTA लगाने के कारण शैलेंद्र सिंह को जेल भेजा गया था। उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर यह कहना सही नहीं है।

शैलेंद्र सिंह जिस मामले में जेल गए थे, वह LMG/POTA केस से अलग मामला था।

उनके इस्तीफे के कुछ महीनों बाद वाराणसी के कैंट थाने में उनके खिलाफ एक FIR दर्ज की गई। मामला जिलाधिकारी कार्यालय से जुड़ा था और इसमें हंगामा, तोड़फोड़, मारपीट तथा सरकारी कर्मचारी के साथ कथित दुर्व्यवहार जैसे आरोप लगाए गए थे।

इस मामले में शैलेंद्र सिंह को गिरफ्तार किया गया और जेल भेजा गया।

इसलिए समाचार में सबसे सटीक वाक्य यह होगा:

“मुख्तार अंसारी के खिलाफ POTA कार्रवाई करने वाले पूर्व DSP शैलेंद्र सिंह को बाद में एक अलग मामले में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था।”


डीएम कार्यालय के मामले में क्या हुआ था?

रिपोर्टों के अनुसार शैलेंद्र सिंह के खिलाफ वाराणसी के कैंट थाने में मामला दर्ज हुआ था। आरोप था कि उन्होंने जिलाधिकारी कार्यालय में हंगामा किया और वहां तोड़फोड़ तथा मारपीट की।

इस मामले में पुलिस ने कार्रवाई की और बाद में चार्जशीट भी दाखिल की गई।

शैलेंद्र सिंह ने इस पूरे मुकदमे को राजनीतिक प्रतिशोध बताया और आरोप लगाया कि यह मामला उन्हें दबाव में लाने के लिए दर्ज कराया गया था। दूसरी ओर, उस समय दर्ज FIR में उनके खिलाफ अलग आरोप लगाए गए थे।

इसलिए इस मामले में भी आरोप और न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य के बीच अंतर करना जरूरी है।


करीब 17 साल तक चला कानूनी संघर्ष

पुलिस सेवा छोड़ने के बाद शैलेंद्र सिंह के जीवन का एक बड़ा हिस्सा कानूनी लड़ाई में बीता।

2021 में जब उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके खिलाफ दर्ज पुराने मामले को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की, तब यह मामला दोबारा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया।

हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार ने अभियोजन वापस लेने की पहल की और वाराणसी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने 6 मार्च 2021 को मामले की वापसी को मंजूरी दी।

अन्य रिपोर्टों में भी पुष्टि हुई कि सहायक अभियोजन अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर सरकार की ओर से मुकदमा वापस लेने की कार्रवाई की गई थी और अदालत ने इसे स्वीकार किया।


2021 में योगी सरकार ने वापस कराया मुकदमा

करीब 17 वर्ष बाद शैलेंद्र सिंह को इस मामले में बड़ी कानूनी राहत मिली।

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने मुकदमा वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद वाराणसी की CJM अदालत ने सरकार के निर्णय को स्वीकार करते हुए मुकदमा वापस लेने का आदेश दिया।

मामला वापस होने के बाद शैलेंद्र सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया था। उन्होंने कहा था कि लंबे संघर्ष के बाद उनके परिवार को बड़ी राहत मिली है।

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि सरकार द्वारा मुकदमा वापस लेने का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने यह घोषित कर दिया कि 2004 में लगाए गए सभी आरोप झूठे थे। कानूनी रूप से यह अभियोजन वापस लेने की प्रक्रिया थी, जिसे अदालत ने मंजूरी दी।


क्या योगी सरकार ने शैलेंद्र सिंह को नौकरी वापस दी?

इस सवाल को लेकर भी कई तरह की बातें सामने आती रही हैं।

उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों के अनुसार, शैलेंद्र सिंह को 2021 में पुलिस सेवा में दोबारा बहाल किए जाने का कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिलता।

2021 में जब उनसे पूछा गया था कि क्या वह दोबारा पुलिस सेवा में लौटना चाहेंगे, तब उन्होंने कहा था कि वह लखनऊ के ग्रामीण क्षेत्र में अपने ऑर्गेनिक फार्महाउस में व्यस्त हैं और वहां के काम से संतुष्ट हैं।

इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि:

योगी सरकार के कार्यकाल में उनके खिलाफ दर्ज पुराने आपराधिक मामले में उन्हें कानूनी राहत मिली, लेकिन उनकी पुलिस नौकरी की बहाली का कोई पुष्ट रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।


पुलिस की वर्दी छोड़कर खेती की ओर मुड़े

पुलिस सेवा से अलग होने के बाद शैलेंद्र सिंह ने अपने जीवन का रास्ता बदल लिया।

रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने लखनऊ के ग्रामीण क्षेत्र में जैविक खेती और पशुपालन से जुड़ा काम शुरू किया।

2021 की रिपोर्टों में भी उनके ऑर्गेनिक फार्महाउस में व्यस्त होने का उल्लेख मिलता है।

2024 में प्रकाशित रिपोर्टों में भी बताया गया कि वह लखनऊ में खेती से जुड़े हुए हैं। अमर उजाला की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, चंदौली के मूल निवासी शैलेंद्र सिंह बाद में लखनऊ में रहकर ऑर्गेनिक खेती और गोसेवा के काम से जुड़े रहे।

यानी जिस व्यक्ति का जीवन कभी पुलिस की कार्रवाई, अपराध और राजनीतिक दबाव के बीच गुजर रहा था, उसने बाद में अपना ध्यान खेती और पशुपालन की ओर मोड़ दिया।


गौशाला और जैविक खेती बना नया रास्ता

शैलेंद्र सिंह की वर्तमान सार्वजनिक पहचान केवल एक पूर्व पुलिस अधिकारी की नहीं रह गई है। उपलब्ध रिपोर्टों में उन्हें जैविक खेती, गौशाला और देशी पशुपालन से जुड़े कामों के साथ जोड़ा गया है।

उनका यह काम एक ऐसे कृषि मॉडल पर केंद्रित बताया गया है जिसमें खेती और पशुपालन को एक-दूसरे से जोड़ा जाता है।

गाय आधारित जैविक कृषि में पशुओं से मिलने वाले गोबर और अन्य जैविक संसाधनों का इस्तेमाल खाद तथा कृषि गतिविधियों में किया जा सकता है। इस तरह खेती की लागत कम करने और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने की कोशिश की जाती है।

हालांकि, उनकी गौशाला या खेती के लिए किसी विशेष सरकारी आर्थिक अनुदान का पुष्ट दस्तावेज उपलब्ध न होने के कारण यह दावा नहीं किया जाना चाहिए कि सरकार ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से कोई विशेष आर्थिक सहायता दी।


राजनीति में भी आजमाया हाथ

पुलिस सेवा से इस्तीफा देने के बाद शैलेंद्र सिंह ने सक्रिय राजनीति में भी कदम रखने की कोशिश की थी।

कुछ रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने चुनाव भी लड़ा और राजनीति में अपराधीकरण के मुद्दे को उठाया। हालांकि उन्हें चुनावी सफलता नहीं मिली।

इस दौर के बाद उनका सार्वजनिक जीवन धीरे-धीरे खेती और सामाजिक गतिविधियों की ओर बढ़ता गया।


2024 में मुख्तार अंसारी की मौत के बाद फिर चर्चा में आए

28 मार्च 2024 को बांदा जेल में मुख्तार अंसारी की मौत के बाद शैलेंद्र सिंह एक बार फिर सुर्खियों में आए।

मीडिया से बातचीत में उन्होंने 2004 के घटनाक्रम को याद किया और कहा कि उस समय मुख्तार अंसारी का प्रभाव बेहद व्यापक था।

उन्होंने दावा किया कि उन्होंने अपनी ड्यूटी के तहत कार्रवाई की थी और इस कार्रवाई की कीमत उन्हें अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर चुकानी पड़ी।

उन्होंने यह भी बताया कि नौकरी छोड़ने के बाद उनके लिए सामान्य जीवन जीना आसान नहीं रहा। 2024 में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने दावा किया कि उन्हें निजी नौकरी में भी परेशानियों का सामना करना पड़ा और कई जगह रहने तक में मुश्किलें आईं।

ये दावे शैलेंद्र सिंह की व्यक्तिगत आपबीती और उनके मीडिया बयानों पर आधारित हैं।


शैलेंद्र सिंह के लिए सबसे बड़ा मोड़ क्या था?

शैलेंद्र सिंह के जीवन में तीन घटनाएं सबसे महत्वपूर्ण दिखाई देती हैं।

पहली — जनवरी 2004 में LMG की बरामदगी और उसके बाद मुख्तार अंसारी के खिलाफ POTA कार्रवाई।

दूसरी — इसके बाद पुलिस सेवा से इस्तीफा और अलग आपराधिक मामले में गिरफ्तारी तथा जेल।

तीसरी — वर्ष 2021 में उत्तर प्रदेश सरकार की पहल पर उस पुराने मामले की वापसी।

इन तीनों घटनाओं ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

एक तरफ वह पुलिस अधिकारी थे, जिनकी पहचान अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने वाले STF अधिकारी के रूप में बनी। दूसरी तरफ उसी कार्रवाई के बाद उन्हें अपनी सरकारी नौकरी छोड़नी पड़ी और वर्षों तक कानूनी विवादों का सामना करना पड़ा।


क्या LMG सीधे मुख्तार अंसारी के घर से बरामद हुई थी?

यहां भी खबर लिखते समय सावधानी जरूरी है।

सोशल मीडिया पर अक्सर दावा किया जाता है कि “मुख्तार अंसारी के घर से सेना की LMG बरामद हुई थी।”

लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों में घटनाक्रम इससे अधिक जटिल है।

रिपोर्टों के अनुसार STF ने दो लोगों को गिरफ्तार कर उनके पास से LMG और करीब 200 कारतूस बरामद किए थे। जांच के दौरान कथित हथियार सौदे का संबंध मुख्तार अंसारी के करीबी लोगों से जोड़ा गया और इसी आधार पर मुख्तार के खिलाफ POTA कार्रवाई की गई।

इसलिए पत्रकारिता की दृष्टि से ज्यादा सटीक शीर्षक या वाक्य होगा:

“मुख्तार अंसारी से जुड़े कथित LMG सौदे का STF ने किया पर्दाफाश, हथियार बरामद होने के बाद POTA कार्रवाई।”


मुलायम सिंह यादव सरकार पर शैलेंद्र सिंह के क्या आरोप थे?

शैलेंद्र सिंह ने कई मौकों पर आरोप लगाया कि तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार मुख्तार अंसारी के खिलाफ की गई कार्रवाई को रोकना चाहती थी।

उन्होंने दावा किया कि उन पर केस कमजोर करने का दबाव बनाया गया और वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर भी कार्रवाई हुई।

2024 में मुख्तार अंसारी की मौत के बाद दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने इन आरोपों को दोहराया और कहा कि उनके ऊपर इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया था।

हालांकि, इन आरोपों को शैलेंद्र सिंह का पक्ष बताते हुए ही प्रकाशित करना चाहिए। इन्हें स्वतंत्र रूप से सिद्ध न्यायिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।


“नौकरी गई, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई”

शैलेंद्र सिंह की कहानी को केवल मुख्तार अंसारी के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित करके देखना अधूरा होगा।

वर्ष 2004 में उन्होंने एक ऐसी कार्रवाई की जिसके बाद उनका पूरा करियर बदल गया। उन्होंने पुलिस सेवा छोड़ दी। इसके बाद उन पर अलग मामला दर्ज हुआ, उन्हें गिरफ्तार किया गया और जेल जाना पड़ा।

करीब 17 साल बाद उस मामले को वापस लेने का रास्ता खुला।

इसके बाद भी उन्होंने पुलिस सेवा में वापसी नहीं की। उन्होंने अपना जीवन खेती, पशुपालन और गौसेवा की ओर मोड़ दिया।

आज उनकी पहचान एक पूर्व पुलिस अधिकारी के साथ-साथ जैविक खेती और गौसेवा से जुड़े व्यक्ति के रूप में भी होती है।


एक पुलिस अधिकारी से किसान तक का सफर

शैलेंद्र सिंह का जीवन उत्तर प्रदेश के उस दौर की एक अलग तस्वीर भी सामने रखता है, जब अपराध, राजनीति और प्रशासन के बीच संबंधों को लेकर लगातार सवाल उठते थे।

2004 में वह STF की वर्दी में थे और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करना उनकी जिम्मेदारी थी। LMG की बरामदगी और POTA कार्रवाई के बाद उनका करियर अचानक राजनीतिक विवादों में घिर गया।

उन्होंने इस्तीफा दिया।

फिर मुकदमा हुआ।

फिर जेल गई।

फिर वर्षों तक कानूनी संघर्ष चला।

और आखिरकार 2021 में मुकदमा वापस हुआ।

इसके बाद उन्होंने अपने जीवन को एक बिल्कुल अलग दिशा दी।

आज खेत, गौशाला और पशुपालन उनके जीवन का हिस्सा हैं।


शैलेंद्र सिंह की कहानी का सबसे बड़ा सवाल

शैलेंद्र सिंह की कहानी केवल एक पुलिस अधिकारी और एक माफिया के बीच संघर्ष की कहानी नहीं है।

यह कहानी उस बड़े सवाल को भी सामने रखती है कि जब कोई अधिकारी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करता है, तब उसे संस्थागत संरक्षण कितना मिलता है?

क्या अधिकारी को राजनीतिक दबाव से स्वतंत्र होकर काम करने की पर्याप्त सुरक्षा मिलती है?

क्या किसी अधिकारी के खिलाफ बाद में दर्ज होने वाले मामलों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित हो पाती है?

और अगर वर्षों बाद किसी मामले को वापस लिया जाता है, तो उस अधिकारी को हुए व्यक्तिगत और पेशेवर नुकसान की भरपाई किस तरह होनी चाहिए?

इन सवालों का कोई सरल उत्तर नहीं है।

लेकिन शैलेंद्र सिंह का मामला निश्चित तौर पर उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक और राजनीतिक इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जिसमें अपराध, पुलिस कार्रवाई, राजनीति, इस्तीफा, जेल और वर्षों बाद मिली कानूनी राहत—सभी एक साथ दिखाई देते हैं।


निष्कर्ष: वर्दी छूटी, लेकिन पहचान आज भी कायम

वर्ष 2004 में शैलेंद्र सिंह की पहचान एक ऐसे STF अधिकारी के रूप में बनी जिसने LMG बरामदगी के बाद मुख्तार अंसारी के खिलाफ POTA की कार्रवाई की।

इसके बाद उन्होंने पुलिस सेवा से इस्तीफा दिया। कुछ समय बाद एक अलग मामले में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। करीब 17 वर्ष तक वह कानूनी प्रक्रिया से जूझते रहे।

वर्ष 2021 में योगी आदित्यनाथ सरकार की पहल पर उनके खिलाफ दर्ज उस मामले को वापस लेने की प्रक्रिया पूरी हुई और वाराणसी की अदालत ने अभियोजन वापसी को मंजूरी दी।

2024 में मुख्तार अंसारी की मौत के बाद शैलेंद्र सिंह फिर चर्चा में आए और उन्होंने दो दशक पुराने घटनाक्रम पर खुलकर बात की।

आज वह पुलिस की वर्दी में नहीं हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक लखनऊ में जैविक खेती, गौशाला और पशुपालन उनके जीवन का हिस्सा बन चुके हैं।

एक समय हाथ में पुलिस की जिम्मेदारी थी, आज खेत और गौशाला उनके जीवन का केंद्र हैं।

शैलेंद्र सिंह की कहानी इसलिए भी चर्चा में रहती है क्योंकि यह केवल एक LMG बरामदगी की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब एक पुलिस कार्रवाई ने एक अधिकारी का पूरा करियर बदल दिया—और वर्षों बाद उसी अधिकारी को अपने खिलाफ चले मुकदमे से राहत मिली।

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