समुद्र मंथन की भांति अंतःकरण का मंथन कर वैचारिक विष का शमन करें : बाबा संजीव आकांक्षी
स्वामी नारदानन्द ऋषि आश्रम में 131वां भंडारा एवं मंगल चिंतन संपन्न
मुरादाबाद। स्वामी नारदानन्द ऋषि आश्रम में 131वां भंडारा एवं मंगल चिंतन श्रद्धा, आध्यात्मिक वातावरण और धार्मिक भावनाओं के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर संत-महात्माओं एवं श्रद्धालुओं ने भगवान शिव की उपासना, सावन मास की महत्ता तथा आध्यात्मिक जीवन में आत्ममंथन के महत्व पर विचार साझा किए।
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मंगल चिंतन के अवसर पर बाबा संजीव आकांक्षी ने कहा कि जिस प्रकार समुद्र मंथन से अमृत के साथ हलाहल विष भी निकला था और भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण किया, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने अंतःकरण का मंथन करते रहना चाहिए। मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और नकारात्मक विचार ही वैचारिक विष का स्वरूप हैं। इनका शमन आत्मचिंतन, संयम, साधना और सकारात्मक विचारों के माध्यम से किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में सावन अथवा श्रावण मास को भगवान शिव की उपासना के लिए अत्यंत पवित्र और फलदायी माना गया है। इस महीने में भगवान शिव के जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और बेलपत्र अर्पित करने की विशेष परंपरा है। सावन मास का संबंध समुद्र मंथन की उस पौराणिक घटना से भी जोड़ा जाता है, जिसमें देवताओं और असुरों द्वारा समुद्र का मंथन किए जाने पर हलाहल विष निकला था।
भगवान शिव ने धारण किया था हलाहल विष
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष के प्रभाव से सृष्टि पर संकट उत्पन्न हो गया था। तब भगवान शिव ने लोककल्याण और सृष्टि की रक्षा के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव को शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर जल और दूध अर्पित किया। इसी धार्मिक परंपरा के अंतर्गत सावन मास में शिवलिंग पर जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक किए जाने की मान्यता है।
बाबा संजीव आकांक्षी ने कहा कि भगवान शिव का यह स्वरूप मनुष्य को त्याग, संयम और लोककल्याण की प्रेरणा देता है। जीवन में आने वाली नकारात्मक परिस्थितियों को अपने ऊपर हावी होने देने के बजाय उन्हें धैर्य और विवेक के साथ नियंत्रित करना ही वास्तविक शिवत्व की ओर बढ़ना है।
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माता पार्वती की तपस्या से जुड़ा है सावन का महत्व
उन्होंने कहा कि धार्मिक मान्यताओं में सावन मास को माता पार्वती की कठोर तपस्या से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया। इसी कारण सावन का महीना मनोकामना पूर्ति, वैवाहिक सुख और पारिवारिक समृद्धि की दृष्टि से भी विशेष माना जाता है।
इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव की आराधना करते हैं और व्रत, पूजा, ध्यान तथा धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से अपनी आस्था प्रकट करते हैं।
चातुर्मास में साधना और ऊर्जा संचय
मंगल चिंतन में बताया गया कि सावन मास के साथ चातुर्मास की धार्मिक परंपरा का भी विशेष महत्व है। मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु आगामी चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि में भगवान शिव के पूजन और साधना का विशेष महत्व माना जाता है।
संत-महात्मा भी इस अवधि में अपने साधना स्थलों पर रहकर तप, ध्यान और आध्यात्मिक साधना में समय व्यतीत करते हैं। स्वामी नारदानन्द ऋषि आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी उपेन्द्रानन्द जी महाराज भी इन चार महीनों के लिए नैमिषारण्य में रहकर तपस्या में लीन रहते हैं। चातुर्मास को आत्मचिंतन, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा के संचय की अवधि के रूप में देखा जाता है।
सावन में शिवभक्ति का विशेष उत्साह
बाबा संजीव आकांक्षी ने कहा कि सावन में वर्षा ऋतु अपने चरम पर होती है। जल जीवन, शीतलता और पवित्रता का प्रतीक है। भगवान शिव को जल और बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा श्रद्धालुओं के मन में आस्था और सकारात्मकता का संचार करती है।
इसी धार्मिक आस्था के कारण सावन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु कांवड़ यात्रा करते हैं और विभिन्न तीर्थस्थलों से पवित्र जल लेकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। मुरादाबाद सहित आसपास के क्षेत्रों में भी सावन के दौरान कांवड़ यात्राओं का विशेष उत्साह देखने को मिलता है।
उन्होंने कहा कि शिव उपासना केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को संयम, धैर्य, त्याग और कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देती है। भगवान शिव का जीवन हमें सिखाता है कि विषम परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रखते हुए समाज और सृष्टि के कल्याण के लिए कार्य किया जा सकता है।
आत्ममंथन से दूर होगा वैचारिक विष
बाबा संजीव आकांक्षी ने कहा कि आज के समय में मनुष्य के सामने बाहरी चुनौतियों के साथ-साथ मानसिक और वैचारिक चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। ऐसे समय में आवश्यक है कि व्यक्ति समय-समय पर अपने विचारों और कर्मों का मूल्यांकन करे।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार समुद्र मंथन से अमृत प्राप्त करने के लिए विष को नियंत्रित करना पड़ा, उसी प्रकार जीवन में सकारात्मकता और ज्ञान का अमृत प्राप्त करने के लिए नकारात्मक विचारों का मंथन आवश्यक है। यदि व्यक्ति अपने भीतर के क्रोध, अहंकार और द्वेष पर नियंत्रण कर ले तो उसका जीवन अधिक शांत, संतुलित और सार्थक बन सकता है।
श्रद्धालुओं एवं गणमान्य लोगों की रही उपस्थिति
131वें भंडारे एवं मंगल चिंतन के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। कार्यक्रम में मुन्ना गुरु, डॉ. बृजपाल सिंह यादव, पंकज शर्मा, प्रमोद रस्तोगी, प्रेमनाथ यादव, विशाखापट्टनम से पधारे विभोर भारद्वाज, दिल्ली से आए आलोक शर्मा, अशोक गुप्ता, संजीव सैनी, नीरज मित्तल, अमित कृष्णात्रेय सहित अन्य श्रद्धालु एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के दौरान धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने संतों के विचारों को सुना और भगवान शिव की आराधना कर लोककल्याण, सुख-शांति और सकारात्मक जीवन की कामना की।







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