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“राजतंत्र अच्छा था या लोकतंत्र?” — राघवेन्द्र सिंह राजू ने उठाए कई बड़े सवाल

“राजतंत्र अच्छा था या लोकतंत्र?” — राघवेन्द्र सिंह राजू ने उठाए कई बड़े सवाल


नई दिल्ली | सागर और ज्वाला न्यूज

देश की राजनीति, समाज और इतिहास को लेकर अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय महामंत्री राघवेन्द्र सिंह राजू ने एक विशेष इंटरव्यू में कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि आज देश में सत्ता पाने के लिए विचारधारा और सिद्धांतों से समझौता करने का दौर चल रहा है, जबकि समाज और राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए।


सुप्रीम कोर्ट में UGC कानून को चुनौती

राघवेन्द्र सिंह राजू ने बताया कि अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद कुंवर हरिवंश सिंह द्वारा UGC से संबंधित कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है।
इस कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें अधिकृत किया गया है।

उन्होंने बताया कि वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता डॉ. ए.पी. सिंह और उनकी टीम के साथ मिलकर इस मामले में पहले स्टे भी प्राप्त किया जा चुका है
अब इस याचिका पर 19 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई निर्धारित है।

राजू ने कहा कि देशभर में सवर्ण समाज के लोग 8 मार्च को नई दिल्ली में विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं और यह भी देखना होगा कि सरकार इस कानून पर क्या रुख अपनाती है।


इतिहास और समाज को लेकर रखे विचार

राघवेन्द्र सिंह राजू ने कहा कि भारत एक ऐसा देश है जिसे “हिंदुस्तान” और “इंडिया” दोनों नामों से जाना जाता है।

उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि आठवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक देश ने कई आक्रमणों का सामना किया, जिनका मुकाबला अनेक वीरों ने अपनी वीरता और बलिदान से किया

उनका कहना है कि देश की आजादी के बाद विभिन्न रियासतों और जागीरों के वारिसों ने अपने अधिकार त्याग कर राष्ट्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया

उन्होंने दावा किया कि 1857 से 1947 के बीच कई रियासतों में कानून-व्यवस्था मजबूत थी और समाज में अनुशासन का वातावरण था।


लोकतंत्र और वर्तमान व्यवस्था पर सवाल

राजू ने कहा कि आज देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध और सामाजिक समस्याओं को देखकर लोगों के मन में सवाल उठते हैं कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपेक्षित सुधार हुए हैं या नहीं।

उन्होंने कहा कि सत्ता को हमेशा सेवा का माध्यम होना चाहिए, लेकिन कई बार यह “मेवा खाने की दुकान” बनती दिखाई देती है।

उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और गुलजारीलाल नंदा की सादगी और समर्पण को आदर्श बताते हुए कहा कि राजनीति में वही मूल्य फिर से स्थापित होने चाहिए।


राजनीति में राजपूत प्रतिनिधित्व पर चिंता

राघवेन्द्र सिंह राजू ने कहा कि समय के साथ राजनीति में राजपूत समाज की भागीदारी कम होती दिखाई दे रही है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि—

  • 1952 में राजस्थान विधानसभा में 180 में से 72 विधायक राजपूत थे।
  • 1980 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के 139 राजपूत विधायक चुने गए थे।
  • 2012 में समाजवादी पार्टी ने 52 राजपूत उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें से 45 जीतकर विधानसभा पहुंचे।

उन्होंने कहा कि आज विभिन्न स्तरों पर समाज की भागीदारी कम दिखाई दे रही है, जिस पर गंभीर चर्चा की जरूरत है।


क्षत्रिय एकता और सामाजिक संगठन पर जोर

राघवेन्द्र सिंह राजू ने “मिशन क्षत्रिय एकता अभियान” के तहत खाड़ी से पहाड़ी तक कई यात्राओं का नेतृत्व करने का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज को अपने इतिहास और मूल्यों को पहचानना होगा।

उन्होंने संत कबीर के दोहे का उल्लेख करते हुए कहा—

“कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूंढे वन माही।”

अर्थात व्यक्ति के भीतर ही उसकी शक्ति और पहचान होती है, उसे बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं।


युवाओं से आह्वान

राजू ने कहा कि समाज को आपसी मतभेद छोड़कर एकजुट होना चाहिए और लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर आवाज उठानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि उन्होंने जीवन के लगभग 40 वर्ष सामाजिक संगठन को समर्पित किए हैं और आज भी स्वयं को कार्यकर्ता ही मानते हैं।


अंत में उनका संदेश

उन्होंने कहा—

“संघे शक्ति कलयुगे”
अर्थात वर्तमान समय में एकता ही सबसे बड़ी शक्ति है।


 

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